*राजहरा उजड़ रहा है*
खनिज संपदा, प्राकृतिक सौंदर्य और गंगा-जमुनी संस्कृति को बचाने की पुकार......
पूर्व प्रधानमंत्रीयो ने आधुनिक भारत के औद्योगिक विकास का जो स्वप्न देखा था, उसमें देश के खनिज एवं औद्योगिक क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनका मानना था कि आर्थिक विकास के बिना भारत का समग्र विकास संभव नहीं है। इसी सोच के परिणामस्वरूप देश में औद्योगिक क्रांति का श्रीगणेश हुआ और राउरकेला, दुर्गापुर, बोकारो तथा भिलाई इस्पात संयंत्र जैसे विशाल इस्पात संयंत्र स्थापित किये गये।
भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए लौह अयस्क की आपूर्ति मुख्यतः दल्ली राजहरा समूह की खदानों — कोकान, राजहरा, कोड़ेकसा, झरन दल्ली, मयूरपानी, महामाया, आरी डोंगरी और दुलकी — से की जाती रही है। संयंत्र हेतु जलापूर्ति भी राजहरा जलाशय, बोइरडीह, हितकसा, तांदुला, गोंदली और खरखरा जैसे बांधों एवं जलाशयों से होती है, जो इसी आदिवासी अंचल में स्थित हैं।
यह क्षेत्र वर्षों से अपने वन, जल, भूमि और खनिज संसाधनों का अपूरणीय त्याग करता आया है। बदले में इसे औद्योगिक दुष्प्रभावों — ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण, सिल्टिंग, वन विनाश और पर्यावरणीय क्षति — का बोझ उठाना पड़ा। खदानों से उड़ती धूल ने नालों और जलस्रोतों को प्रदूषित कर दिया है, जिससे खेती, जलवायु और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।
*प्रकृति की अनुपम देन* — दल्ली राजहरा
राजहरा को प्रकृति ने मुक्त हाथों से संवारा है। चारों ओर फैले सागौन, साजा एवं अन्य वृक्षों के विशाल वन, औषधीय पौधों की संपदा और मीठे पानी के कल-कल करते झरने इस क्षेत्र को अद्वितीय बनाते हैं। “झरन दल्ली” नाम अपने आप में इस प्राकृतिक वैभव की पहचान है।
ऊँची-नीची पहाड़ियाँ, अथाह खनिज संपदा, रंग-बिरंगे पत्थर, सफेद, लाल और पीली छुई मिट्टी की खदानें इस क्षेत्र को समृद्ध बनाती हैं। यहाँ केवल लौह अयस्क ही नहीं, बल्कि यूरेनियम और अन्य बहुमूल्य खनिज भी पाए जाते हैं।
राजहरा के समीप स्थित महामाया क्षेत्र प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। पहाड़ी पर विराजमान माँ महामाया देवी का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। माता के चरणों से निकलने वाले त्रिवेणी स्वरूप तीन झरनों का मीठा जल आज भी लोगों को आश्चर्यचकित करता है, क्योंकि तीनों जलधाराओं का स्वाद अलग-अलग है। सदियों पुरानी महामाया देवी एवं गणेश जी की मूर्तियाँ यहाँ की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत की साक्षी हैं।
*प्रेम, भाईचारा और गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल*
दल्ली राजहरा केवल खनिज संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक एकता और भाईचारे के लिए भी जाना जाता है। देश के विभिन्न राज्यों से आये लोग यहाँ वर्षों से प्रेम और सौहार्द के साथ रहते आये हैं।
चाहे 1984 के सिख विरोधी दंगे रहे हों या 1992 के बाद की तनावपूर्ण परिस्थितियाँ — राजहरा सदैव शांत रहा। यहाँ मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, बौद्ध विहार और प्रजापिता ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालय के केंद्र सभी एक साथ सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं। यही अपनापन लोगों को राजहरा से भावनात्मक रूप से जोड़े रखता है।
*विकास की जगह उपेक्षा*
करोड़ों रुपये की खनिज रॉयल्टी देने वाला यह क्षेत्र आज शासकीय उपेक्षा का शिकार है। उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का गंभीर अभाव यहाँ के लोगों को पलायन के लिए मजबूर कर रहा है।
बी.एस.पी. की “कमाओ और समेटो” नीति तथा नई नियुक्तियों के अभाव में टाउनशिप के अनेक क्वार्टर खंडहर बन चुके हैं। कोण्डे, पावरहाउस, पंडर दल्ली और 256 क्षेत्र तेजी से खाली होते जा रहे हैं। डैम साइड, बोइरडीह और झरन नाला जैसे क्षेत्र उजाड़ हो चुके हैं। जो डैम कभी पानी से लबालब भरे रहते थे, वे अब खदानों की मिट्टी और धूल से पट चुके हैं।
नगर के झरने धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। महामाया मार्ग और पुराना बाजार धूल के गुबार से प्रभावित हैं। नागरिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। बी.एस.पी. द्वारा संचालित अधिकांश शिक्षण संस्थान बंद कर दिये गये हैं। अस्पतालों की स्थिति भी चिंताजनक है, जहाँ गंभीर मरीजों को भिलाई रेफर करना मजबूरी बन चुकी है।
*खेल, शिक्षा और रोजगार पर संकट*
राजहरा ने देश को अनेक प्रतिभाशाली खिलाड़ी, कलाकार और युवा दिये हैं, परंतु सुविधाओं के अभाव में नई पीढ़ी निराश होकर पलायन कर रही है। खेल सुविधाएँ समाप्तप्राय हैं और युवाओं को रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे।
एकमात्र शासकीय नेमीचंद जैन कॉलेज अपनी बदहाली के लिए चर्चित है। तकनीकी शिक्षण संस्थानों और उच्च स्तरीय चिकित्सालयों का अभाव इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विडंबना है।
*पर्यटन की अपार संभावनाएँ*
यदि शासन इच्छाशक्ति दिखाये तो दल्ली राजहरा और महामाया क्षेत्र को छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित किया जा सकता है। प्राकृतिक झरने, पहाड़ियाँ, खनिज संपदा, धार्मिक स्थल और शांत वातावरण इसे अद्वितीय बनाते हैं।
परंतु दुर्भाग्य यह है कि करोड़ों रुपये की रॉयल्टी देने के बावजूद क्षेत्र विकास के लिए पर्याप्त राशि खर्च नहीं की जाती। यहाँ तक कि सड़क मरम्मत के लिए भी लोगों को आंदोलन और भूख हड़ताल करनी पड़ती है।
*भूमि खरीद पर प्रतिबंध भी विकास में बाधा*
डौंडी ब्लॉक में सामान्य वर्ग के लोगों द्वारा आवासीय भूमि की खरीद-बिक्री पर लगी पाबंदी भी क्षेत्र के विकास में बड़ी बाधा है। बी.एस.पी. एवं रेलवे के सेवानिवृत्त अधिकारी-कर्मचारी यहाँ बसना चाहते हैं, परंतु भूमि संबंधी प्रतिबंधों के कारण वे न तो यहाँ स्थायी रूप से बस पाते हैं और न ही व्यापार स्थापित कर पाते हैं।
*क्या होना चाहिए?*
राजहरा को बचाने और पुनः विकसित करने के लिए निम्न कदम अत्यंत आवश्यक हैं —
बी.एस.पी. अस्पताल का आधुनिक सुविधाओं सहित उन्नयन।
खनिज रॉयल्टी का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा स्थानीय विकास पर खर्च।
उच्च शिक्षण एवं तकनीकी संस्थानों की स्थापना।
खेल सुविधाओं और रोजगार के अवसरों का विस्तार।
पर्यटन विकास हेतु विशेष योजना।
पर्यावरण संरक्षण एवं झरनों के पुनर्जीवन के प्रयास।
भूमि खरीद संबंधी नीतियों में व्यवहारिक सुधार।
राजनीति से ऊपर उठकर सामूहिक विकास की भावना।
*राजहरा केवल एक नगर नहीं* — एक भावना है
राजहरा की मिट्टी, यहाँ का पानी, यहाँ का अपनापन और यहाँ की गंगा-जमुनी संस्कृति लोगों के हृदय में बसती है। यहाँ पूरा भारत बसता है। यह क्षेत्र केवल खनिजों का भंडार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, प्रकृति और मानवीय मूल्यों की जीवंत मिसाल है।
आज आवश्यकता है कि शासन, प्रशासन, बी.एस.पी. प्रबंधन और समाज मिलकर राजहरा को बचाने के लिए गंभीर प्रयास करें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस पावन धरा की पहचान और गौरव को महसूस कर सकें।
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छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा, छत्तीसगढ़