विश्व विरासत दिवस 2026: संघर्ष और आपदा के बीच अपनी जड़ों को बचाने की मुहिम

विश्व विरासत दिवस 2026: संघर्ष और आपदा के बीच अपनी जड़ों को बचाने की मुहिम

विश्व विरासत दिवस 2026: संघर्ष और आपदा के बीच अपनी जड़ों को बचाने की मुहिम

विश्व विरासत दिवस 2026: संघर्ष और आपदा के बीच अपनी जड़ों को बचाने की मुहिम

नई दिल्ली/डिजिटल डेस्क: हर साल 18 अप्रैल को पूरी दुनिया 'विश्व विरासत दिवस' (World Heritage Day) के रूप में मनाती है। यह दिन केवल पुरानी इमारतों को देखने का नहीं, बल्कि मानवता के उस इतिहास और संस्कृति को सहेजने का है, जिसने हमें आज की पहचान दी है।

​इस अवसर पर सांस्कृतिक संरक्षण के पैरोकार प्रशांत कुमार क्षीरसागर ने इस दिन के महत्व और वर्ष 2026 की विशेष थीम पर अपने विचार साझा किए हैं।

2026 की थीम: संकट में विरासत का बचाव

​इस वर्ष की थीम "संघर्षों और आपदाओं के संदर्भ में जीवित विरासत के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया" रखी गई है। प्रशांत कुमार क्षीरसागर ने बताया कि इस थीम का मुख्य उद्देश्य युद्ध, प्राकृतिक आपदा या किसी भी आकस्मिक संकट के दौरान हमारी धरोहरों की सुरक्षा करना है।

​"अक्सर हम नुकसान होने के बाद मरम्मत की बात करते हैं, लेकिन इस साल का फोकस 'पूर्व-तैयारी' पर है। हमें अपने मंदिरों, स्मारकों और परंपराओं को बचाने के लिए एक ऐसी इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम और सिस्टम की जरूरत है जो संकट के समय ढाल बनकर खड़ी हो सके।" — प्रशांत कुमार क्षीरसागर


विरासत क्यों है जरूरी?

​क्षीरसागर के अनुसार, विरासतें केवल पर्यटन का जरिया नहीं हैं, बल्कि:

  • ​यह हमें हमारी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती हैं।
  • ​आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत इतिहास पुस्तक की तरह काम करती हैं।
  • ​देश की अर्थव्यवस्था और गौरव को वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान करती हैं।

हमारी जिम्मेदारी: कैसे करें संरक्षण?

​अपनी विरासत को बचाने के लिए किसी बड़े बजट की नहीं, बल्कि एक अच्छी सोच की जरूरत है। क्षीरसागर ने कुछ छोटे मगर प्रभावी कदम सुझाए हैं:

  1. स्वच्छता: ऐतिहासिक स्थलों पर कूड़ा-कचरा न फैलाएं।
  2. मर्यादा: स्मारकों की दीवारों पर कुछ भी न लिखें और उन्हें नुकसान न पहुँचाएँ।
  3. जागरूकता: अपने आसपास के लोगों और बच्चों को इन स्थलों के इतिहास के बारे में बताएँ।

एक नज़र इतिहास पर

​विश्व विरासत दिवस की नींव 1982 में 'इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड साइट्स' (ICOMOS) द्वारा रखी गई थी। इसकी महत्ता को देखते हुए 1983 में यूनेस्को (UNESCO) ने इसे आधिकारिक मान्यता दी, जिसके बाद से यह एक वैश्विक आंदोलन बन गया है।


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