*राजयोगिनी बीके गीता दीदी का जीवन दिव्य गुणों की मिसाल — बीके स्वाति दीदी*

*राजयोगिनी बीके गीता दीदी का जीवन दिव्य गुणों की मिसाल — बीके स्वाति दीदी*

*राजयोगिनी बीके गीता दीदी का जीवन दिव्य गुणों की मिसाल — बीके स्वाति दीदी*
प्रेस विज्ञप्ति।
*राजयोगिनी बीके गीता दीदी का जीवन दिव्य गुणों की मिसाल — बीके स्वाति दीदी*
19 फरवरी 2026, बिलासपुर।प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय बिलासपुर की सबसे पुरानी एवं मुख्य शाखा, टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित राजयोग भवन में ब्रह्माकुमारीज का बिलासपुर में बीजारोपड करने वाली राजयोगिनी बीके गीता दीदी जी का 12वीं पुण्य स्मृति दिवस मनाया गया। 
इस अवसर पर सेवाकेन्द्र संचालिका बीके स्वाति दीदी ने कहा कि गीता दीदी का सम्पूर्ण जीवन दिव्य गुणों का जीवंत स्वरूप था। वे सदा शांत, सुलझे और समाधान स्वरूप आत्मा बनकर सभी के सामने रहीं।
आदरणीय गीता दीदी में सबसे प्रमुख गुण था—अहंकार से पूर्णतः मुक्त रहना। विशाल सेवा क्षेत्र, जिम्मेदारियाँ और सम्मान होने के बावजूद उनके मन में सदा “मैं नहीं, ईश्वरीय निमित्त” की भावना रही। वे हर आत्मा को समान दृष्टि से देखती थीं—चाहे वह नया जिज्ञासु हो या पुराना सेवाधारी। उनके लिए हर आत्मा मूल्यवान थी।
उनका धैर्य और सहनशीलता अनुकरणीय थी। कठिन परिस्थितियों में भी वे स्थिर रहतीं और समस्याओं को समाधान में बदलने की कला सिखाती थीं। उनकी उपस्थिति मात्र से वातावरण में शांति का अनुभव होता था। यही कारण था कि अनेक लोग केवल उनसे मिलने भर से ही मानसिक हल्कापन और नई ऊर्जा का अनुभव करते थे।
सेवा के क्षेत्र में आदरणीय गीता दीदी का योगदान अत्यंत व्यापक और प्रभावशाली रहा। उन्होंने मध्य प्रदेश, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों में आध्यात्मिक सेवा करते हुए आत्म-जागरण का कार्य किया। विशेष रूप से बिलासपुर उनकी मुख्य कर्मभूमि रही, जहाँ उन्होंने 1976 से 2014 तक निरंतर सेवा करते हुए आध्यात्मिकता का बीजारोपण किया। उनके प्रयासों से अनेक आत्माओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया और राजयोग के माध्यम से आत्मिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
गीता दीदी का जीवन निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक था। उन्होंने कभी यश या प्रशंसा की अपेक्षा नहीं की, बल्कि जन-जन तक परमात्मा के शांति, पवित्रता और आत्म-परिवर्तन के संदेश को पहुँचाने में स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर दिया। उन्होंने यह सिखाया कि सच्ची आध्यात्मिकता जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन को श्रेष्ठ बनाने की कला है।
बीके स्वाति दीदी ने कहा यह अवसर केवल स्मरण का नहीं, बल्कि उन दिव्य गुणों और आध्यात्मिक मूल्यों को जीवन में धारण करने का संकल्प लेने का दिन रहा, जिन्हें आदरणीय गीता दीदी ने अपने कर्म, आचरण और सेवाभाव से प्रत्यक्ष किया।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित भाई-बहनों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि गीता दीदी की दृष्टि में हमेशा भविष्य के प्रति आशा और सकारात्मकता रहती थी। वे हर आत्मा में छिपी श्रेष्ठता को पहचानती थीं और उसे उभारने के लिए प्रेमपूर्ण मार्गदर्शन देती थीं। उनका विश्वास था कि जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेती है, तब जीवन स्वतः ही परिवर्तन की ओर बढ़ता है।
पुण्य स्मृति दिवस के इस पावन अवसर पर सभी ने यह संकल्प लिया कि आदरणीय गीता दीदी के बताए हुए मूल्यों—शांति, सहनशीलता, निःस्वार्थ सेवा और ईश्वरीय मर्यादाओं में जीवन जीने—को अपने जीवन में उतारेंगे। यद्यपि वे आज हमारे बीच साकार रूप में उपस्थित नहीं हैं, परंतु उनके संस्कार, उनके गुण और उनकी प्रेरणा आज भी असंख्य आत्माओं के जीवन को प्रकाशमान कर रहे हैं। कार्यक्रम के अंत में सभी ने आदरणीय राजयोगिनी गीता दीदी जी को स्नेह-सुमन अर्पित करने के पश्चात प्रसाद ग्रहण किया।
ईश्वरीय सेवा में,
बीके स्वाति
राजयोग भवन, बिलासपुर

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