डोण्डी जैन अनुयायियों ने पयुषर्ण पर्व में की धर्म आराधना व बताया क्षमा पर्व का महत्व
ओम गोलछा:डोण्डी जैन धर्म में पयुषर्ण पर्व के आठ दिन तपस्या व धर्म आराधना की ठाट रही जैन संघ से आये दो स्वाध्याय बहनों द्वारा प्रतिदिन धर्म शिक्षा से समाज को दिशा दिखलाई गयी। अंतिम दिन समस्त जैन महिला परुष व बच्चों द्वारा सांवत्सरिक प्रतिक्रमण किया जाता है। इसमें वर्ष भर में किए गए पापों का प्रायश्चित किया जाता है। इस दिन क्षमा याचना की जाती है। क्षमा याचना का यह पर्व पर्युषण में महत्वपूर्ण है। इसको लेकर आराधना व साधना से समाज के प्रमुखों ने संवददाता से क्षमा याचना पर्व को लेकर अपने विचार साझा किए है।
देखा देखी नहीं, अंतरात्मा से मांगे क्षमा
समाज के प्रमुख कन्हैया लाल बाघमार,सुभाष ढ़ेलडिया,उत्तम चंद,मदन लाल गुणधर, माणक लाल गुणधर,संतोष ढ़ेलडिया, रतन लाल कोठारी ने बताया कि जिन शासन की परंपरा में स्वयं को खोजना, जागरूक करना, स्वयं की आत्मा को निर्मल करना हो तो पर्युषण पर्व बहुत खास होता है। इस पर्व में आराधना का जो माहौल बनता है वह स्वर्णिम होता है। एक दिन क्षमा मांगना पूर्णता नहीं होती लेकिन जिन शासन कहता है कि हर गलती जानबूझकर नहीं होती। जैन धर्मावलंबियों द्वारा गलतियों का प्रायश्चित सुबह शाम प्रतिक्रमण से किया जाता है। लोग वर्तमान में एक दिन की क्षमा मांगने से खुद को पाप मुक्त मान लेते है लेकिन इंसान तभी अपनी गलतियों से मुक्त हो सकता है, जब वह अंतर्मन और अंतरात्मा से क्षमा मांगे। क्षमा याचना देखा देखी करने से नहीं अंतर्मन व अंतरात्मा से होनी चाहिए।
पर्युषण पर्व में महत्वपूर्ण है क्षमापना
समाज के युवा साधर्मी सुरेश बाघमार,पूनम कोठारी,लक्ष्मी कांत जैन
पिंटू नाहर, लाल चंद संचेती,मांगीलाल गुणधर,सुनील बाघमार,अजय बाघमार ने बताया कि
संवत्सरी से पहले सारे जीवों से क्षमापना करनी है। वर्तमान में व्यक्ति जिसके साथ कुछ हुआ ही नहीं उसके साथ क्षमापना करेगा। लेकिन वास्तविक आराधना तभी होगी जब जिसके साथ हमारा मनमुटाव है, क्लेश, मन में वैर है उस व्यक्ति से क्षमापना करनी है। जब तक मन में किसी व्यक्ति के प्रति वैर की गांठ है, किसी के प्रति मन में द्वेष है। तब तक हमारा मोक्ष नहीं होगा। भगवान महावीर ने सिखाया है कि सारे जीवों से मैत्रीभाव रखो और हम उनकी ही बात भूल गए। प्रभु ने कितने ऊपर कितने लोगों ने कष्ट किया, परंतु फिर भी परमात्मा क्षमा भाव में रहे तो क्या हम किसी को क्षमा नहीं दे सकते। सच्चा धर्म तभी प्रकट होता है जब हृदय में क्षमापना प्रकट होता है।
जैन महिला मण्डल के ममता जैन( पार्षद),ममता बाघमार,सपना बाघमार,ललिता गुणधर,दीप्ति गुणधर,सुनीता गोलछा,ने बताया कि
क्षमायाचना का पर्व है संवत्सरी
जिनशासन में प्रथम कर्तव्य है अमारी प्रवर्तन अर्थात जीव-दया का पालन करना, अहिंसा का पालन करने से हिंसक प्रवृत्ति दूर होती है। दूसरा- साधर्मिक भक्ति है, इसमें कमजोर भाई-बहनों को आर्थिक, शारीरिक व सामाजिक दृष्टि से सक्षम बनाना। तीसरा क्षमापना है, इसमें सभी जीवों को क्षमा करना व स्वयं क्षमा मांगना, इससे मित्रता बढ़ती है। चौथा अट्ठम तप है, इससे आहार संज्ञा पर विजय प्राप्त होती है।पांचवां चैत्यपरिपाटी अर्थात् प्रभु दर्शन से परमात्मा स्वरूप की प्राप्ति होती है। पर्यूषण के आठ दिन के मेले में क्षमायाचना का पर्व ही संवत्सरी है।
शुद्ध भाव से मांगनी चाहिए क्षमा
भगवान महावीर ने अहिंसा परमोधर्म का सबसे बड़ा मूलमंत्र दिया है। पर्युषण में सात दिन के व्याख्यान और तप से क्षमापना के मार्ग की तरफ हर किसी को अग्रसर करते है। साल भर की गलतियों के लिए क्षमा हृदय से मांगना ही सच्ची क्षमापना है। आजकल सोशल प्लेटफार्म पर संदेश भेजकर क्षमा मांगना सही नहीं है। क्षमा हृदय से, सर्वजन से, बिना शर्त के, चिरंजीवी और ज्ञान गर्भित होनी चाहिए। पर्युषण में मिच्छामि दुक्कड़म वह मंत्र है जो संवत्सरी को सार्थक करता है। जिनशासन में क्षमा से बढ़कर कोई भाव नहीं है और जिनशासन का यह भाव हर प्राणी मात्र के जीवन को सफल और सुंदर बना सकता है।