एक गुरु ही अपने शिष्य को अंधकारमय जीवन से प्रकाश की ओर ले जाता है - एम एस श्रीजीत
गुरौ न प्राप्यते यत्तन्नान्यत्रापि हि लभ्यते ।
गुरूप्रसादात् सर्वं तु प्राप्रोंत्येव न संशयः।। अर्थात गुरू के द्वारा जो प्राप्त नहीं होता, वह अन्यत्र भी नहीं मिलता
गुरू कृपा से निःसन्देह मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर ही लेता है। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले गुरु की जयंती गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। आज गुरु पूर्णिमा को हमे अपने जीवन मे मिले हर उस गुरु का स्मरण और सम्मान करना चाहिए जिन्होंने हमारे जीवन को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाई हो। गुरु - शिष्य का एक ऐसा रिश्ता जो जीवन के आखिरी समय तक भी नहीं मिटता कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की राह दिखाता है। आज एक स्कूल में अध्यापक के रूप में कार्य करते हुए मुझे ये ज्ञात हुआ कि की किस प्रकार एक शिक्षक एक विद्यार्थी के जीवन मे बदलाव ला सकता है। कैसे एक शिक्षक का धैर्यपूर्वक संकल्प ही विद्यार्थियों में निरंतर आगे बढ़ने की आशा का संचार कर सकता है। परंतु आज की पीढ़ी गुरु शिष्य की भारतीय संस्कृति एवं उससे जुड़े बहुत से बातो से रूबरू नही है। भारतीय संस्कृति में गुरू को सर्वोच्च स्थान दिया गया है परंतु आज वो स्थान केवल इतिहास बन कर रहा गया है, कुछ देशों में शिक्षकों को एक अलग दर्जा प्राप्त है वहां वीआईपी श्रेणी में गुरु को शामिल किया जाता है। भारतवर्ष में गुरुओं के सम्मान के लिए शिक्षकों के सम्मान के लिए एक विशेष दिवस के अवसर का इंतजार रहता है। यह विद्यालय के साथ-साथ अभिभावकों का भी कर्तव्य है कि वह छात्रों को इस बात की शिक्षा दें की उनके जीवन में एक गुरु कि क्या मायने है। विद्या और गुरु शब्द का वास्तविक अर्थ समझ सके तो गुरु पूर्णिमा के वास्तविक भाव को समझने में सक्षम हो सकेंगे।
आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।
एम एस श्रीजीत की कलम से ।