सादर प्रकाशनार्थ प्रेस विज्ञप्ति
*मुश्किलों से बाहर निकालता है दुआओं का कवच - ब्रह्माकुमारी संतोषी दीदी*
24 अक्टूबर 2026 बिलासपुर। ब्रह्मांड का यह नियम अटल है—'जैसा बोओगे, वैसा काटोगे'। हम जो भी विचार, बोल या कर्म इस सृष्टि में भेजते हैं, वह कई गुना होकर हमारे पास ही लौटकर आता है। जेल की चारदीवारी के भीतर रहने वालों के लिए वर्तमान परिस्थितियां उनके अतीत के किन्हीं गलत कर्मों का परिणाम हो सकता हैं, लेकिन उनका भविष्य पूरी तरह से उनके वर्तमान के श्रेष्ठ कर्मों पर निर्भर करता है। उक्त वक्तव्य प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरी विश्व विद्यालय बिलासपुर की मुख्य शाखा राजयोग भवन की वरिष्ठ राजयोग शिक्षिका संतोषी दीदी ने बिलासपुर केंद्रीय जेल में बंदियों को अध्यात्म के सबसे महत्वपूर्ण नियम 'कर्मों के सिद्धांत' को बेहद सरल और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया।
दीदी ने आगे बताया कि 'पर-निंदा' (दूसरों की बुराई करने) को सबसे सूक्ष्म पाप बताते हुए इसके कार्मिक प्रभाव को विस्तार से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जब हम किसी व्यक्ति की पीठ पीछे निंदा करते हैं, तो हम अनजाने में एक बहुत बड़ा आध्यात्मिक नुकसान कर रहे होते हैं। कर्मों की गुप्त गति के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी की बुराई करता है, तो वह वास्तव में उस व्यक्ति के नकारात्मक कर्मों और पापों के बोझ को अपने सिर पर खींच रहा होता है। सरल शब्दों में, जिस व्यक्ति की बुराई की जा रही है, उसके पाप कम हो जाते हैं और निंदा करने वाले के खाते में वे पाप जुड़ जाते हैं।
इससे भी गंभीर बात यह है कि जो लोग इस निंदा को मूक दर्शक या श्रोता बनकर सुनते हैं, वे भी कर्मों के इस नकारात्मक चक्र से बच नहीं पाते। दीदी ने सचेत किया कि बुराई को सुनना, उसे मौन सहमति देना है। जब आप किसी की बुराई को रस लेकर सुनते हैं, तो आप उस नकारात्मक ऊर्जा को अपने भीतर सोख रहे होते हैं। कर्मों के खाते के अनुसार, जितने लोग उस निंदा को सुनते हैं, वे सभी उस पाप के बराबर के हिस्सेदार (भागीदार) बन जाते हैं।
इस गहरे सिद्धांत को समझाते हुए उन्होंने बंदियों से कहा कि यदि कोई आपके सामने किसी तीसरे की बुराई शुरू भी करे, तो उसे तुरंत रोक दें या वहां से हट जाएं। किसी के अवगुणों को सुनना अपने मन के सुंदर घर में कचरा इकट्ठा करने जैसा है। इसके विपरीत, यदि हम हर एक के प्रति शुभचिंतक की भावना रखेंगे, सबको दुआएं देंगे और किसी के अवगुणों को न देखकर केवल उसके गुणों को धारण करेंगे, तो हमारा पुण्य का खाता जमा होगा। यही पुण्य का खाता हमें हर संकट से बचाएगा और जीवन को सुखमय बनाएगा। दीदी ने आगे कहा कि क्रिया की प्रतिक्रिया होता है, वैसे ही आध्यात्मिक जगत में भी भावनाओं और संकल्पों का सीधा रिटर्न मिलता है। जब हम किसी को दुआएं, शुभकामनाएं या सम्मान देते हैं, तो ब्रह्मांड का यह नियम है कि वे दुआएं कई गुना होकर, एक सुरक्षा कवच के रूप में हमारे पास वापस लौटती हैं।
दीदी ने जेल के बंदियों को प्रेरित करते हुए कहा कि दुआएं कमाना जीवन की सबसे बड़ी और सच्ची संपत्ति है। जब आप अपनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद दूसरों के प्रति शुभ भावना रखते हैं और उन्हें दिल से दुआएं देते हैं, तो रिटर्न में मिलने वाली वे दुआएं आपके जीवन की कठिन से कठिन राह को भी सुगम बना देती हैं। दुआएं एक ऐसी अलौकिक और गुप्त शक्ति हैं, जो मनुष्य को बड़े से बड़े संकट, मानसिक तनाव और अदृश्य मुश्किलों से बहुत आसानी से बाहर निकाल लाती हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कोई व्यक्ति गंभीर संकट या कर्मों के कड़े बंधन में फंसा होता है, तब उस समय किसी की आत्मा से निकली हुई सच्ची दुआ ही सबसे बड़ा सहारा बनती है। यदि हम हर घड़ी, हर एक को केवल दुआएं देने का पुरुषार्थ करेंगे, तो हमारा 'पुण्य का खाता' इतनी तेजी से बढ़ेगा कि जीवन की बड़ी से बड़ी मुश्किलें भी रूई के फाहे की तरह हल्की होकर उड़ जाएंगी। दीदी ने दशहरे के आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वास्तविक रावण बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपा हुआ है। अपने अंदर के क्रोध, मोह, लोभ, और अपराध बोध जैसे बुराई व अवगुण रूपी रावण को जलाने और हमेशा के लिए खत्म करने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि जेल सुधार की एक तपोभूमि है, जहाँ आत्म-मंथन करके एक नया और श्रेष्ठ इंसान बना जा सकता है।
इसी क्रम में, भ्राता डॉ. केके तिवारी ने बंदियों को संबोधित करते हुए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के अंतर्संबंध को समझाया। भ्राता डॉ. तिवारी ने कहा कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है। उन्होंने बंदियों को जेल परिसर में उपलब्ध संसाधनों के बीच दिनचर्या को व्यवस्थित करने, नियमित योग-प्राणायाम करने और तनाव से मुक्त रहने के व्यावहारिक तरीके बताए। उन्होंने मानसिक तनाव और अवसाद को दूर करने के लिए सकारात्मक सोच और मेडिटेशन को अपनाने पर विशेष बल दिया।
ईश्वरीय सेवा में
ब्रह्माकुमारी स्वाति
राजयोग भवन, बिलासपुर