कब तक सियासत की भेंट चढ़ेंगे हमारे नौनिहालों के ख्वाब? ग्राम पथराटोला में ₹5 करोड़ की लागत से बनने वाला विज्ञान केंद्र केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि हमारे वनवासी अंचल के मासूम बच्चों के सपनों की वो खिड़की है, जहां से वे अंतरिक्ष को छूने और नई दुनिया को गढ़ने की उम्मीद देख रहे थे। पर अफ़सोस, उस खिड़की को भी सियासत के बंद दरवाजों के पीछे धकेलने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।

कब तक सियासत की भेंट चढ़ेंगे हमारे नौनिहालों के ख्वाब? ग्राम पथराटोला में ₹5 करोड़ की लागत से बनने वाला विज्ञान केंद्र केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि हमारे वनवासी अंचल के मासूम बच्चों के सपनों की वो खिड़की है, जहां से वे अंतरिक्ष को छूने और नई दुनिया को गढ़ने की उम्मीद देख रहे थे। पर अफ़सोस, उस खिड़की को भी सियासत के बंद दरवाजों के पीछे धकेलने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।

कब तक सियासत की भेंट चढ़ेंगे हमारे नौनिहालों के ख्वाब? ग्राम पथराटोला में ₹5 करोड़ की लागत से बनने वाला विज्ञान केंद्र केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि हमारे वनवासी अंचल के मासूम बच्चों के सपनों की वो खिड़की है, जहां से वे अंतरिक्ष को छूने और नई दुनिया को गढ़ने की उम्मीद देख रहे थे। पर अफ़सोस, उस खिड़की को भी सियासत के बंद दरवाजों के पीछे धकेलने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।

कब तक सियासत की भेंट चढ़ेंगे हमारे नौनिहालों के ख्वाब?


​लाल धूल, दूषित पानी और खदानों के भारी प्रदूषण को अपने सीने में समेटे डौंडी की धरती आज फिर एक गहरे दर्द से गुजर रही है। जिस माटी ने वर्षों से सिर्फ खोया है, आज जब उसी माटी के बच्चों की आंखों में विज्ञान के जरिए एक नई रोशनी उतरने वाली थी, तो उस पर भी राजनीति का काला साया गहराने लगा है।

​ग्राम पथराटोला में ₹5 करोड़ की लागत से बनने वाला विज्ञान केंद्र केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि हमारे वनवासी अंचल के मासूम बच्चों के सपनों की वो खिड़की है, जहां से वे अंतरिक्ष को छूने और नई दुनिया को गढ़ने की उम्मीद देख रहे थे। पर अफ़सोस, उस खिड़की को भी सियासत के बंद दरवाजों के पीछे धकेलने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।

​दर्द पर मरहम की दरकार थी, किसी का हक छीनना नहीं!

​यह सच है कि डौंडी के खदान प्रभावित गांवों में आज भी बुनियादी जरूरतों की जंग जारी है। लोग लाल पानी पी रहे हैं, टूटी सड़कें और लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाएं रोज किसी न किसी जिंदगी का इम्तिहान लेती हैं। इस बदहाली के खिलाफ उठने वाली हर आवाज जायज है, हर दर्द सच्चा है।

​लेकिन दिल को झकझोरने वाला सवाल यह है—क्या बड़ों के हक की लड़ाई बच्चों के भविष्य की बलि चढ़ाकर लड़ी जाएगी? क्या सड़कों और पानी के अभाव का बदला उन नन्हें हाथों से लिया जाएगा, जो कलम और विज्ञान की ताकत से अपनी तकदीर बदलना चाहते हैं? अगर पैसों या प्रक्रियाओं में कोई खोट है, तो उसकी जांच हो, पारदर्शिता आए। पर बच्चों के हिस्से की रोशनी छीन लेना कौन सा इंसाफ है?

​सड़क पर उतरने को विवश होता समाज और गूंजते सवाल

​सर्व आदिवासी समाज और गोंडवाना महासभा के जिम्मेदारों की आंखों में यह टीस साफ झलक रही है। वे कहते हैं—"हमारे बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ अब बर्दाश्त से बाहर है। अगर यह सपना छीना गया, तो समाज सड़क पर उतरकर जवाब देगा।" वहीं क्षेत्रीय विधायक अनिला भेड़िया का दो टूक कहना है कि डौंडी के बच्चों के हक पर आंच आई, तो यह गूंज जिले से लेकर पूरे प्रदेश तक सुनाई देगी।

​एक और सपना अधूरा रह गया तो...?

​डौंडी के लोग पहले ही 100 बिस्तर अस्पताल, प्रयास विद्यालय और केंद्रीय विद्यालय जैसे अधूरे पड़े वादों के बोझ तले दबे हैं। हर बार एक उम्मीद जगती है, और हर बार वह उम्मीद सियासत के भारी पहियों के नीचे कुचल दी जाती है।

​अब एक ही सवाल हर डौंडीवासी के दिल में चुभ रहा है—"क्या हमारे बच्चों का कसूर सिर्फ इतना है कि वे खदानों के साए में पैदा हुए हैं? क्या उनके आसमान में उड़ने के सपनों को भी राजनीति का ग्रहण लग जाएगा?"

​हुक्मरानों को समझना होगा कि सियासत कल भी होगी और वादे फिर दोहराए जाएंगे, लेकिन जो बचपन आज बिना सपनों के ढल गया, उसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।

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