*सर्व समाज समरसता समिति अध्यक्ष पुरोबी वर्मा का रक्षाबंधन पर भाइयों के नाम मार्मिक संदेश - बहन सिर्फ एक नहीं, समाज की हर बेटी बहन है*
*सर्व समाज समरसता समिति अध्यक्ष पुरोबी वर्मा का रक्षाबंधन पर भाइयों के नाम मार्मिक संदेश - बहन सिर्फ एक नहीं, समाज की हर बेटी बहन है*
*दल्ली राजहरा।* भारतीय संस्कृति में जब सुख, समृद्धि और आदर्श राज्य की कल्पना की जाती है, तब हर किसी के मन में एक ही नाम आता है - राम राज्य। राम राज्य की कल्पना कोई आसान बात नहीं है। राम का नाम लेते ही मन में एक ऐसे चित्र का उदय होता है, जहां शांत वातावरण हो, समृद्ध और सुखमय जीवन हो, लोग एक-दूसरे के प्रति सम्मान और आदर की भावना रखते हों।
*रक्षा सूत्र - एक धागा नहीं, एक अटूट विश्वास*
भाई-बहन के बीच निस्वार्थ प्रेम का त्योहार रक्षाबंधन कई मान्यताओं और परंपराओं के साथ हमारा देश मनाने जा रहा है। रक्षाबंधन मात्र एक रेशम का धागा नहीं है, यह एक ऐसी डोर है, जिसमें कोई बंध जाता है तो उसके प्रति मन में श्रद्धा, प्रेम और उसकी रक्षा करने का एक अटूट बंधन बन जाता है।
सिर्फ एक मां की कोख से जन्म लेने वाले, चाचा, मौसी या खून के रिश्ते ही नहीं, ऐसे कई अनजान रिश्ते भी राखी के बंधन में बंधे हैं, जो जन्म से मरण तक इस रक्षा सूत्र को निभाते आए हैं। हमारी भारतीय संस्कृति में कई ऐसे शूरवीर हुए हैं, जिन्होंने इस रक्षा सूत्र की मर्यादा को बनाए रखा है। हमारे धार्मिक ग्रंथ महाभारत में जब भगवान श्रीकृष्ण की उंगली कट गई थी, तब महारानी द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़ कर उनके हाथों में बांध दी थी, जिसका ऋण भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के विकट समय में चीर हरण से बचाकर चुकाया था। यही इस पवित्र धागे की शक्ति है।
*आज रिश्तों में क्यों आ रही है दूरी?*
आज की वर्तमान स्थिति बहुत विकट हो गई है। हममें एक-दूसरे के प्रति असहिष्णुता की भावनाएं पैदा हो रही हैं। भाई और बहन के बीच का प्रेम भी एक दिखावा बनकर रह गया है। मां और पिता के न रहने पर बहन के लिए भाई का घर ही मायका हुआ करता था, आज वही भाई का घर बहन के लिए अनजान और पराया होता जा रहा है। संपत्ति और स्वार्थ की दीवारें रेशम की इस डोर से ज्यादा मजबूत होती जा रही हैं।
हमें अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा को बचाए रखने के लिए फिर से उसी युग में लौटना होगा, तभी हम राम राज्य की कल्पना को साकार कर सकते हैं।
*एक मार्मिक अपील - हर बेटी में अपनी बहन देखो*
भाई-बहन के प्रेम और सद्भावना का यह पर्व कई मायने में भारतीय संस्कृति के लिए महत्व रखता है। यह विश्वास का त्योहार है। एक बात विशेष तौर पर हमें वर्तमान दौर में सोचना होगा - क्या हम एक ही मां के पेट से जन्म लेने वाले लड़के और लड़की ही इस रक्षाबंधन के पवित्र सूत्र में बंधते हैं? क्या एक खून से उत्पन्न व्यक्ति ही इस सूत्र का हकदार है?
यदि संसार वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को लेकर चल रहा है, तो क्या किसी पुरुष के लिए अन्य कोई भी महिला या लड़की बहन नहीं हो सकती? यदि हम भारतीय परंपरा और संस्कृति को लेकर चलते हैं तो यदि हर पुरुष अपनी बहन के साथ-साथ बहन की उम्र की अन्य सभी लड़कियों को भी बहन की दृष्टि से देखे और बहन मानकर उनकी रक्षा करे, तो वर्तमान युग में महिलाओं और बच्चियों के साथ हो रही घृणित घटनाओं पर कुछ हद तक लगाम लगाया जा सकता है।
*भाइयों से विनम्र निवेदन*
इसके लिए पुरुष वर्ग को जिस तरह की अभद्र टिप्पणी और व्यवहार लेकर वह घर से बाहर निकलता है, उसे रोकना होगा। उन्हें मन में यह बैठाना होगा कि संसार में सिर्फ मेरी ही बहन नहीं है, और भी भाइयों की बहन मेरी बहन की तरह है। जिस तरह मैं अपनी बहन के प्रति की जा रही अभद्र व्यवहार और टिप्पणी को बर्दाश्त नहीं कर सकता, उसी तरह दूसरी बहनों के प्रति भी मेरे मन में श्रद्धा और सद्भावना लानी होगी।
साथ ही बहनों को भी मर्यादा में रहकर भाइयों के प्रति श्रद्धा और आदर की भावना लानी होगी, तो मैं मानती हूं कि रक्षाबंधन का यह पावन पर्व सार्थक होगा। सार्थकता लाने के लिए हमारे मन में विश्वास और श्रद्धा लानी होगी। तभी हम राम राज्य की कल्पना को साकार कर सकते हैं।
*इस रक्षाबंधन पर एक वचन लें*
इस वर्ष के रक्षाबंधन पर मैं सभी बहनों से अपील करती हूं कि रक्षा सूत्र भाइयों को बांधने से पहले यह वचन भी उनसे लें कि - "अपनी बहन की तरह अन्य भाइयों की बहन को भी मैं बहन की नजर से देखूंगा और उसकी रक्षा करूंगा।"
*- पुरोबी वर्मा*
*अध्यक्ष, सर्व समाज समरसता समिति, दल्ली राजहरा*