आज संत नामदेव महाराज मंदिर मे आषाढी एकादशी पर्व मनाया गया प्रातः सुबह मंदिर काकड आरती पूजा शृंगार किया गया
आज संत नामदेव महाराज मंदिर मे आषाढी एकादशी पर्व मनाया गया प्रातः सुबह मंदिर काकड आरती पूजा शृंगार किया गया
अभिषेक के बाद श्री विठ्ठल रखुमाई मंदिर प्रतिमा सुंदर फुलो से शृंगार किया गया श्री संत नामदेव महाराज फुलो से श्री गार किया गया हरिपाठ भजन कीर्तन किया गया आरती के बाद प्रसाद वाटा गया जय जय हरी विठ्ठल जय पांडुरंग श्री संत शिरोमणी नामदेव महाराज जय कारे जय घोषकिया गयाइस कार्यक्रम के अवसर पर प्रशांत कुमार शिरसागर उषा शिरसागर तबला वादक एम के पाटील पियुष रुद्र क्षीरसागर समस्त विठ्ठल भक्त जन उपस्थित थे# आषाढ़ी एकादशी: भक्ति, परंपरा और आध्यात्मिक साधना का महापर्व
**आषाढ़ी एकादशी** (जिसे **देवशयनी एकादशी**, **महा-एकादशी** या **हरिशयनी एकादशी** भी कहा जाता है) सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म के सबसे पावन और महत्त्वपूर्ण व्रतों में से एक है। यह प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह दिन केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है, बल्कि यह आत्म-साधना, सामाजिक समरसता और अटूट भक्ति का एक अनुपम उदाहरण है।
## 1. धार्मिक पृष्ठभूमि और पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ी एकादशी का संबंध भगवान विष्णु के क्षीरसागर में योगनिद्रा में जाने से है।
* **योगनिद्रा का प्रारंभ:** मान्यता है कि इस दिन से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा (गहरी आध्यात्मिक निद्रा) में चले जाते हैं।
* **चातुर्मास की शुरुआत:** इसी दिन से **चातुर्मास** (चार महीने की अवधि: आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और कार्तिक) की शुरुआत होती है। इस समय प्रकृति में वर्षा ऋतु का आगमन होता है और जीव-जंतुओं की सुरक्षा तथा मानसिक संयम के लिए साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर तपस्या और प्रवचन करते हैं।
* **मांगलिक कार्यों पर विराम:** इन चार महीनों के दौरान विवाह, मुंडन, मुंडन संस्कार, नए गृह में प्रवेश जैसे सांसारिक मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं, क्योंकि भगवान विष्णु (सृष्टि के पालनहार) निद्रा में होते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी (**देवउठनी एकादशी**) को जब भगवान जागते हैं, तब पुनः शुभ कार्य प्रारंभ होते हैं।
## 2. पंढरपुर की 'वारी' और वारकरी संप्रदाय
आषाढ़ी एकादशी का सबसे भव्य, जीवंत और अलौकिक रूप महाराष्ट्र के **पंढरपुर** शहर में देखने को मिलता है। यहाँ भगवान विष्णु के अवतार **श्री विट्ठल** (विठोबा) और माता रुक्मिणी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है।
### वारी परंपरा क्या है?
महाराष्ट्र में 'वारी' का अर्थ है - *नियमित रूप से की जाने वाली यात्रा*। संत ज्ञानेश्वर महाराज (अलंदी से) और संत तुकाराम महाराज (देहू से) की पालकियों (पादुकाओं) को लेकर लाखों 'वारकरी' (भक्त) सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर पंढरपुर पहुँचते हैं।
* **अभंग और हरिनाम संकीर्तन:** वारकरी अपने हाथों में चिपली, ताल और मृदंग लेकर *"ज्ञानबा-तुकाराम"*, *"जय जय विट्ठल हरी विट्ठल"* और संतों द्वारा रचित 'अभंग' गाते हुए झूमते हैं।
* **सामाजिक समरसता का प्रतीक:** इस वारी में जाति, धर्म, ऊँच-नीच या अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता। यहाँ हर पुरुष भक्त को 'माउली' (मां के समान) कहा जाता है और सभी एक-दूसरे के चरण स्पर्श करके अभिवादन करते हैं।
## 3. आषाढ़ी एकादशी व्रत विधि और नियम
इस पावन तिथि पर व्रत रखने से मन की शुद्धि होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
| चरण | पूजा विधि / नियम |
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| **प्रातः काल** | सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदी या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (पीले रंग के वस्त्र श्रेष्ठ) धारण करें। |
| **संकल्प** | भगवान विष्णु/विट्ठल के समक्ष हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें। |
| **पूजा अर्चना** | भगवान को तुलसीदल (तुलसी के पत्ते), पीले फूल, चंदन, अक्षत, और पंचामृत अर्पित करें। तुलसी के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। |
| **कथा व आरती** | देवशयनी एकादशी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें और 'ॐ जय जगदीश हरे' अथवा विट्ठल भगवान की आरती करें। |
| **आहार नियम** | इस दिन पूर्ण उपवास रखा जाता है या फलाहार (दूध, फल, मखाना, साबूदाना) लिया जाता है। तामसिक भोजन और अन्न पूरी तरह वर्जित होता है। |
## 4. आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आषाढ़ी एकादशी केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है, इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और स्वास्थ्य संबंधी आधार भी है:
* **मानसिक संयम:** वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही शरीर का पाचन तंत्र धीमा हो जाता है। उपवास रखने से शरीर को डिटॉक्स (विषमुक्त) होने का अवसर मिलता है और पाचन संबंधी समस्याओं से बचाव होता है।
* **अंतर्मुखी होने का समय:** चातुर्मास के प्रारंभ के साथ ही बाहरी भागदौड़ को कम करके अपने भीतर झांकने, ध्यान लगाने और आध्यात्मिक अध्ययन करने की प्रेरणा मिलती है।
## 5. सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश
आषाढ़ी एकादशी हमें **समर्पण, नम्रता और भाईचारे** का संदेश देती है। पंढरपुर वारी में लाखों लोगों का बिना किसी अव्यवस्था या अहंकार के एक साथ पैदल चलना यह दर्शाता है कि जब भक्ति निष्काम होती है, तो समाज में स्वतः ही शांति और अनुशासन स्थापित हो जाता है।
इस कार्यक्रम के अवसर पर प्रशांत कुमार श्रीसागर ऊषा श्रीसागर ओम श्रीसागर पीयूश श्रीसागर एम के पाटिल भक्त जन उपस्थित थे।