किसान चेतना के पुरोधा : स्वर्गीय नेमसिंह साहू
संघर्ष, साहस और किसान अस्मिता के अमर हस्ताक्षर
छत्तीसगढ़ की धरती सदैव संघर्षशील व्यक्तित्वों की कर्मभूमि रही है। इसी पावन भूमि ने एक ऐसे किसान नेता को जन्म दिया, जिसने अपना संपूर्ण जीवन किसानों, मजदूरों और शोषित वर्ग की आवाज बनने में समर्पित कर दिया। वह नाम था — स्वर्गीय नेमसिंह साहू।
तत्कालीन मध्यप्रदेश में किसान आंदोलनों को नई दिशा देने वाले स्व. नेमसिंह साहू केवल एक नेता नहीं, बल्कि किसान चेतना के सशक्त प्रतीक थे। उनका जीवन संघर्ष, त्याग, साहस और जनसेवा की अनुपम मिसाल है।
स्वर्गीय नेमसिंह साहू का जन्म 3 अक्टूबर 1937 को ग्राम कोहंगाटोला में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय हलधर सिंह साहू तत्कालीन मालगुजार थे तथा माता श्रीमती दुलौरिन बाई धार्मिक एवं संस्कारवान महिला थीं। बाल्यकाल में ही पिता का साया उठ जाने से जीवन संघर्षों से भर गया, किंतु विपरीत परिस्थितियों ने उनके व्यक्तित्व को और अधिक दृढ़ एवं जुझारू बना दिया।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा ग्राम रेवती नवागांव एवं कोहंगाटोला में प्राप्त की। माध्यमिक शिक्षा बालोद तथा उच्च शिक्षा दुर्ग एवं रायपुर में पूरी की। दुर्गा कॉलेज रायपुर से स्नातक की शिक्षा ग्रहण करते हुए उनमें सामाजिक चेतना और नेतृत्व क्षमता का निरंतर विकास हुआ। छात्र जीवन से ही वे विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर सक्रिय रहे। यही सक्रियता आगे चलकर उन्हें किसानों की लड़ाई का अग्रदूत बना गई।
स्व. नेमसिंह साहू ने राजनीति में प्रवेश बड़े भाई इन्द्रजीत साहू के सहयोगी के रूप में किया, किंतु शीघ्र ही उन्होंने स्वयं को जनआंदोलनों के प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित कर लिया। वर्ष 1971 में किसान मजदूर संघ के गठन के समय उन्हें महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई। संगठन के अध्यक्ष लोचन सिंह साहू थे, लेकिन आंदोलन की धार को जन-जन तक पहुंचाने में नेमसिंह साहू की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
उस दौर में किसानों की समस्याएं अत्यंत गंभीर थीं। धान खरीदी की लेव्ही नीति, सिंचाई संकट, बिजली समस्या और फसल के उचित मूल्य जैसे मुद्दों पर उन्होंने लगातार संघर्ष किया। वे मानते थे कि “किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।” यही कारण था कि उन्होंने किसान हितों के लिए किसी भी सत्ता के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उन्हें प्रदेश स्तर पर नई पहचान दिलाई। तत्कालीन मध्यप्रदेश में लोकतंत्र और किसान अधिकारों की लड़ाई में वे अग्रिम पंक्ति के सेनानी रहे। उनका संघर्ष इतना प्रभावी था कि उसकी गूंज दिल्ली की सत्ता तक सुनाई देती थी।
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे कठिन दौर माना जाता है। इस कालखंड में स्व. नेमसिंह साहू ने लगभग 20 माह जेल में रहकर यातनाएं सहीं। उन्हें शासन द्वारा आंदोलन समाप्त करने और शपथ पत्र देकर समझौता करने के लिए बार-बार दबाव डाला गया, लेकिन उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। जेल में रहते हुए उन्होंने अनशन जारी रखा। इसी दौरान उन्हें गंभीर बीमारी और तपेदिक (टीबी) जैसी जानलेवा बीमारी का सामना करना पड़ा। दो बार रायपुर के डी.के. अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, फिर भी उनका मनोबल कभी नहीं टूटा।
उनके जीवन का यह संघर्ष और भी मार्मिक हो जाता है, जब यह ज्ञात होता है कि जेल में रहते हुए ही उनकी माता और पुत्री का निधन हो गया था। एक ओर व्यक्तिगत पीड़ा और दूसरी ओर लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई—इन दोनों परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने संकल्प को कमजोर नहीं होने दिया। यही उनका अद्भुत व्यक्तित्व था।
वर्ष 1977 में उन्होंने जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ा। यद्यपि उन्हें चुनावी सफलता नहीं मिली, किंतु उनका संघर्ष और जनाधार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। वे उन नेताओं में थे जिनकी पहचान सत्ता से नहीं, बल्कि संघर्ष से बनी।
स्वर्गीय नेमसिंह साहू का पूरा जीवन किसानों के अधिकारों के लिए समर्पित रहा। वे केवल भाषण देने वाले नेता नहीं थे, बल्कि खेत-खलिहान में किसानों के बीच रहने वाले जननेता थे। किसानों की समस्या ही उनकी अपनी समस्या थी। यही कारण है कि आज भी छत्तीसगढ़ के किसान आंदोलनों के इतिहास में उनका नाम अत्यंत सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है।
उनकी संघर्षशील विरासत आज उनके पुत्र पवन साहू आगे बढ़ा रहे हैं, जो प्रदेश स्तरीय किसान नेता के रूप में अपनी पहचान रखते हैं तथा भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। यह उनके परिवार की जनसेवा परंपरा का निरंतर प्रवाह है।
स्वर्गीय नेमसिंह साहू का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने सिद्ध किया कि सच्चा नेतृत्व वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी जनता के साथ खड़ा रहे। किसान, मजदूर और आमजन के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष सदैव स्मरणीय रहेगा।
आज जब हम उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं, तब यह केवल एक व्यक्ति को श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस विचारधारा को नमन है जिसने किसानों की आवाज को शक्ति दी, संघर्ष को सम्मान दिया और जनसेवा को जीवन का सर्वोच्च धर्म माना।
स्व. नेमसिंह साहू सदैव जनमानस की स्मृतियों में अमर रहेंगे।
लेखक
डॉ.अशोक आकाश