*आध्यात्मिक साहित्य के शिखर पुरुष थे जगदीश जी, उनका जीवन हम सबके लिए प्रकाश पुंज - बीके स्वाति दीदी*

*आध्यात्मिक साहित्य के शिखर पुरुष थे जगदीश जी, उनका जीवन हम सबके लिए प्रकाश पुंज - बीके स्वाति दीदी*

*आध्यात्मिक साहित्य के शिखर पुरुष थे जगदीश जी, उनका जीवन हम सबके लिए प्रकाश पुंज - बीके स्वाति दीदी*
*आध्यात्मिक साहित्य के शिखर पुरुष थे जगदीश जी, उनका जीवन हम सबके लिए प्रकाश पुंज - बीके स्वाति दीदी*
12 मई 2026, बिलासपुर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय बिलासपुर की मुख्य शाखा टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित राजयोग भवन में संस्थान के महान चिंतक, प्रखर लेखक और प्रखर वक्ता वरिष्ठ राजयोगी ब्रह्माकुमार जगदीश जी का 25वां पुण्य स्मृति दिवस अत्यंत सादगी और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस विशेष अवसर पर सेवाकेन्द्र संचालिका बीके स्वाति दीदी ने जगदीश भाई जी के तपस्वी जीवन और मानवता के प्रति उनके महान योगदान को याद करते हुए उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि आदरणीय भ्राता जगदीश जी संस्थान के उन आधार स्तंभों में से एक थे, जिन्होंने अपने लेखन और वाणी के माध्यम से ईश्वरीय ज्ञान को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई। उन्होंने सैकड़ों पुस्तकों की रचना की, जो आज भी साधकों के लिए मार्गदर्शन का स्रोत हैं। दीदी ने बताया कि जगदीश भाई जी का जीवन सादगी, समर्पण और अटूट ईश्वरीय विश्वास का जीवंत उदाहरण था। उन्होंने अपना सर्वस्व लोक कल्याण और मानवता की सेवा में समर्पित कर दिया था।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि आदरणीय जगदीश भाई जी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती आध्यात्मिक संस्था थे। आध्यात्मिक साहित्य के शिखर पुरुष थे। उनका अनुशासन और समय की पाबंदी हर किसी के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार जगदीश भाई जी ने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी लेखनी को रुकने नहीं दिया और जटिल आध्यात्मिक रहस्यों को सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाया। 
बीके स्वाति दीदी ने बताया कि स्वयं संस्थान के संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा बाबा ने जगदीश भाई जी को उनकी तीव्र बुद्धि और दिव्य दृष्टि के कारण 'गणेश' और 'संजय' की उपाधि दी थी। मुल्तान में जन्मे जगदीश भाई जी लौकिक जीवन में एक प्रोफेसर थे, लेकिन आध्यात्मिक प्यास उन्हें 1950 के दशक में ब्रह्माकुमारीज़ की ओर ले आई। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सादगी और मितव्ययिता के साथ ईश्वरीय सेवा में समर्पित कर दिया। वे संस्थान के मुख्य अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता और 200 से अधिक पुस्तकों के प्रणेता थे। उन्होंने 'ज्ञानामृत' और 'प्योरिटी' जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से जटिल आध्यात्मिक रहस्यों को सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाया। उनकी लेखनी ने न केवल भारत बल्कि रूस और अन्य यूरोपीय देशों में भी राजयोग की नींव को मजबूत किया। अंत में दीदी ने सभी को उनके द्वारा रचित साहित्य को पढ़ने और उसे जीवन में उतारने का आह्वान किया।
ईश्वरीय सेवा में, 
बीके स्वाति
राजयोग भवन, बिलासपुर

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