*मन, वचन और कर्म की त्रिवेणी से ही जीवन में आएगी सुख-शांति"- बीके संतोषी दीदी*

*मन, वचन और कर्म की त्रिवेणी से ही जीवन में आएगी सुख-शांति"- बीके संतोषी दीदी*

*मन, वचन और कर्म की त्रिवेणी से ही जीवन में आएगी सुख-शांति"- बीके संतोषी दीदी*
प्रेस विज्ञप्ति
*मन, वचन और कर्म की त्रिवेणी से ही जीवन में आएगी सुख-शांति"- बीके संतोषी दीदी* 
14 अप्रैल 2026, बिलासपुर। भरारी ग्राम में आयोजित 'नवधा रामायण' के पावन अवसर पर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, बिलासपुर मुख्य सेवाकेंद्र राजयोग भवन से पधारीं वरिष्ठ राजयोग शिक्षिका एवं मुख्य वक्ता संतोषी दीदी ने रामायण के आध्यात्मिक रहस्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि रामायण केवल एक प्राचीन कथा नहीं, बल्कि वर्तमान समय में जीवन जीने की एक श्रेष्ठ कला और मार्गदर्शिका है। 
मन, वचन और कर्म की त्रिवेणी से ही जीवन में आएगी सुख-शांति" विषय पर बोलते हुए उन्होंने रामायण के प्रसंगों के माध्यम से आधुनिक जीवन की समस्याओं का समाधान बताया। श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए संतोषी दीदी ने जीवन प्रबंधन के गूढ़ सूत्रों को बहुत ही सरल ढंग से समझाया। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हमारे जीवन की गुणवत्ता बाहरी भौतिक सुविधाओं से नहीं, बल्कि हमारे विचारों की शुद्धता, बोल की मधुरता और व्यवहार की शालीनता पर टिकी है। 
उन्होंने रामायण का उदाहरण देते हुए बताया कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामजी का चरित्र हमें सिखाता है कि जो हमारे मन में हो, वही हमारे वचन में आना चाहिए और वही हमारे कर्म में दिखना चाहिए। जब इन तीनों का संगम (त्रिवेणी) होता है, तभी मनुष्य का व्यक्तित्व प्रभावशाली और जीवन शांत बनता है।
दीदी ने विस्तार से तीनों बिंदुओं को स्पष्ट किया कि हमारे मन में उठने वाले विचार ही हमारे जीवन का आधार हैं। रामायण का हर पात्र हमें मानसिक दृढ़ता सिखाता है। यदि मन में ईर्ष्या और द्वेष (जैसे मंथरा का पात्र) हो, तो राजमहल में भी कलह पैदा हो जाती है। इसलिए सकारात्मक चिंतन से मन को शुद्ध रखना अनिवार्य है। यदि मन में किसी के प्रति भी कड़वाहट, ईर्ष्या या घृणा है, तो उसका सीधा असर हमारे मानसिक स्वास्थ्य और संबंधों पर पड़ता है। परिवार में प्रेम और सामंजस्य बनाए रखने की लिए हम अपने मन को नकारात्मकता से मुक्त रखें।
 रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाहुं बरु बचनु न जाई' के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे शब्द किसी को घाव भी दे सकते हैं और मरहम भी लगा सकते हैं। संयमित और मधुर वाणी ही रिश्तों में प्रेम बनाए रखती है।शब्द एक ऐसी औषधि हैं जो घाव भर भी सकते हैं और घाव दे भी सकते हैं। दीदी ने कहा कि हमारे बोल में शहद जैसी मधुरता और स्वभाव में फूलों जैसी नम्रता होनी चाहिए। कड़वे बोल न केवल दूसरों को आहत करते हैं, बल्कि हमारे अपने व्यक्तित्व की गरिमा को भी कम करते हैं।
हनुमान जी के सेवा भाव और भरत के त्याग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि निस्वार्थ कर्म ही मनुष्य को महान बनाते हैं। हमारे द्वारा किया गया हर छोटा-बड़ा कर्म ही हमारे भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है। मर्यादित और शुभ कर्म ही श्रेष्ठ संस्कारों को जन्म देते हैं। यदि हम अपने आचरण में मर्यादा और अनुशासन रखते हैं, तो घर-परिवार ही स्वर्ग के समान बन जाता है।
कार्यक्रम को सफल बनाने में राम चरित्र मानस समिति अध्यक्ष एवं ग्राम भरारी के सरपंच विनय कुमार शुक्ला जी तथा डॉक्टर कृष्ण कुमार तिवारी जी का विशेष सहयोग रहा। मंच पर ब्रह्माकुमारी संतोषी दीदी एवं रुक्मणी दीदी की गरिमामयी उपस्थिति रही। उनकी प्रेरणादायी सेवाओं और आध्यात्मिक उद्बोधन के लिए आयोजन समिति द्वारा उन्हें प्रशंसा पत्र एवं श्रीफल प्रदान कर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामवासी उपस्थित थे।

ईश्वरीय सेवा में 
बीके स्वाति
राजयोग भवन, बिलासपुर

Ads Atas Artikel

Ads Atas Artikel 1

Ads Center 2

Ads Center 3