**मैंने बहुत बाद में जाना : स्त्री, त्याग और अपनी प्राथमिकताएँ****रश्मि वर्मा रायपुर जिला अध्यक्ष ग्रामीण भाजपा महिला मोर्चा**
**मैंने बहुत बाद में जाना : स्त्री, त्याग और अपनी प्राथमिकताएँ***
*रश्मि वर्मा रायपुर जिला अध्यक्ष ग्रामीण भाजपा महिला मोर्चा**
खरोरा
मैंने अपने जीवन के एक लंबे समय के बाद यह समझा कि मेरी अपनी प्राथमिकताएँ भी कोई अर्थ रखती हैं। जीवन का बड़ा हिस्सा मैंने इस सोच में गुज़ार दिया कि मैं दूसरों के लिए कितनी उपयोगी हूँ—मैं कितनी सहायता कर सकती हूँ, कितनी समस्याएँ अपने ऊपर ले सकती हूँ और कितनी ज़िम्मेदारियाँ बिना प्रश्न स्वीकार कर सकती हूँ।
मेरे लिए उपयोगी होना ही जैसे मेरे अस्तित्व का प्रमाण बन गया था। यह प्रयास निरंतर चलता रहा कि कोई असंतुष्ट न रहे, कोई नाराज़ न हो, कोई यह न कह दे कि मैं “अब पहले जैसी नहीं रही।” इसी क्रम में कई बार मेरे अपने निर्णय भी दूसरों की सुविधा के अधीन होते चले गए। यहाँ तक कि मेरा स्वयं का घर बसाने का विचार भी कुछ लोगों को असुविधाजनक लगा—क्योंकि तब मैं “व्यस्त” हो जाती, और उनकी सहायता कौन करता?
यह कोई व्यक्तिगत घटना मात्र नहीं है। यह उस सामूहिक स्त्री-अनुभव का हिस्सा है, जिसमें बेटियों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि उन्हें दूसरों को क्या देना है—समय, श्रम, भावनाएँ, समझौता। इसके बदले उन्हें क्या चाहिए, इस प्रश्न पर उनका अधिकार लगभग अदृश्य कर दिया जाता है। जो कुछ भी मिलता है, वह अधिकार नहीं कहलाता, बल्कि कृपा या दया की श्रेणी में रख दिया जाता है।
समाज ने महिलाओं के लिए “कम में जीना” एक आदर्श की तरह स्थापित कर दिया है। अपने लिए कुछ माँगना स्वार्थ माना जाता है, और न माँगना महानता। त्यागमयी स्त्री—माँ, बहन, बहू—तभी आदर्श मानी जाती है जब उसे कुछ न चाहिए हो। उसका न चाहना ही परिवार के अन्य सदस्यों के लिए मानसिक आराम का कारण बनता है।
यह विचारधारा कब और कैसे इतनी गहराई से समाज में पैठ गई, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। इसका प्रभाव इतना व्यापक रहा कि उपवास, व्रत, निर्जला व्रत, सहनशीलता और मौन—अधिकतर स्त्रियों के हिस्से आए। त्याग के इन प्रतीकों को धर्म, परंपरा और संस्कार के नाम पर महिमामंडित किया गया। वहीं परिवार के अन्य सदस्य सामान्य रूप से भोजन करते, आराम करते और जीवन की सहजताओं का उपभोग करते रहे।
यहाँ प्रश्न त्याग का नहीं है। त्याग अपने आप में नकारात्मक नहीं होता। समस्या तब उत्पन्न होती है जब त्याग विकल्प नहीं, बल्कि अपेक्षा बन जाए; जब वह स्वेच्छा से नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव से किया जाए। आत्म-त्याग और आत्म-विस्मरण के बीच की रेखा बहुत पतली होती है, और अक्सर स्त्रियाँ अनजाने में उसे पार कर जाती हैं।
समय के साथ जब आत्मचिंतन होता है, तब यह समझ में आता है कि यदि कोई स्त्री दूसरों के लिए इतना सोच सकती है, तो अपने लिए सोचना भी उसका अधिकार है। स्वयं को प्राथमिकता देना स्वार्थ नहीं है; यह आत्मसम्मान की पहली सीढ़ी है। एक पूर्ण, संतुलित और संतुष्ट स्त्री ही वास्तव में अपने परिवार और समाज के लिए सकारात्मक भूमिका निभा सकती है।
श्री रोहित वर्मा जी की खबर