शरीर रूपी हवनकुण्ड में डाली जाती हैं ज्ञान रूपी आहुतियाॅ - संत रामबालकदास जी
मानव शरीर ही पवित्र हवन कुण्ड है इसमें कथामृत के माध्यम से धर्म, ज्ञान, विवेक रूपी आहुति डाली जाती है।
संत श्री रामबालकदास जी ने श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के बारे में बताते हुये कहा कि यज्ञशाला में बने हवन कुण्ड में आहुति डाली जाती है उसी प्रकार श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में भी कथा के माध्यम से शरीर रूपी हवन कुण्ड में धर्म, ज्ञान, विवेक रूपी आहुतियाॅ डाली जाती हैं। इसे स्वीकार करेंगे तो ज्ञानयज्ञ है नहीं तो केवल कथा। भागवत की कथा केवल कहनी सुननी नहीं है बल्कि भागवत धर्म हमारे जीवन में आना चाहिये। भगवान के गुणों को धारण करना ही भागवत धर्म है। परहित, परोपकार का धर्म निभाने वालों को भागवती कहते हैं। अपने दुख की परवाह न करते हुये दूसरों के दुख को दूर करने वाला ही भागवती कहलाता है। भागवत कथा को केवल सुनना नहीं है बल्कि इसे जीना चाहिये। ध्रुव, प्रहलाद, जटायु, शुकदेव आदि भगवान के ऐसे परमभक्त हैं जिन्हें परम भागवती कहा जाता है।