नीच व्यक्ति जिससे बढ़ाई पाता है पहले उसी को नष्ट करता है, इसलिए ऐसे व्यक्ति का संगत त्याग दें :श्री राम बालक दास जी,,
नीच व्यक्ति जिससे बढ़ाई पाता है पहले उसी को नष्ट करता है, इसलिए ऐसे व्यक्ति का संगत त्याग दें :श्री राम बालक दास जी,,
प्रतिदिन की भांति आज भी ऑनलाइन सत्संग का आयोजन पाटेश्वर धाम के संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा वाट्सएप ग्रुप में किया गया जिसमें भक्तगण जुड़कर अपनी विभिन्न जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किये।
आज की सत्संग परिचर्चा में बाबा जी ने गणेश जी के 11 दिवसीय विशेष पर्व पर महत्व डालते हुए बताया कि, भगवान श्री गणेश के प्रत्येक रूप का अपना विशेष महत्व है इसीलिए हिंदू धर्म में गणेश जी प्रथम पूज्य है
सत्संग परिचर्चा में जिज्ञासा रखते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने पूछा कि वेद की ऋचा गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कबीनामुपश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ न: श्रृण्वन्नतिभि: सीद सादनम्।। का भावार्थ समझाने की कृपा करेंगे बाबाजी।, भाव को स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि: गणों प्रार्थनाओं के समूह के बीच , आप जो गणपति प्रार्थना के भगवान हैं, हम आपको अपना बलिदान चढ़ाते हैं , आप ज्ञानी हैं और महिमा में सबसे ऊपर हैं , आप प्रार्थनाओं के सबसे प्रमुख राजा हैं, जो प्रार्थनाओं के भगवान ब्राह्मणस्पति के रूप में अध्यक्षता करते हैं, कृपया हमारे आह्वान को सुनकर हमारे पास आएं और उपस्थित रहें इस पवित्र बलि वेदी की यज्ञ में हमारी प्रार्थनाओं को अपनी शक्ति और बुद्धि से ऊर्जा देने के लिए।
गिरधर सोनवानी जी ने जिज्ञासा रखी थी समर्पण का भाव क्या है एवं लक्षण कैसे होते हैं कृपया मार्गदर्शन करें, बाबा जी ने बताया कि एक भक्त जब अपने भगवान के प्रति, एक सेवक ज़ब स्वामी के प्रति, एक अंश जब अपने अंशी के प्रति समर्पित होता है तो वह समर्पण का भाव अपने आपको मिटा देने का होता है जो इस भाव से समर्पण करता है वही सच्चा समर्पण होता है जिस तरह से विभिन्न नदियां चाहे गंगा व यमुना हो या सरस्वती या कोई भी अन्य नदी जब वह बहते हुए समुद्र में मिलती है तो समुद्र बन जाती है वैसे ही हमारा भी समर्पण भाव होना चाहिए जब हम किसी में आस्था रखते हैं या उसमें भगवान मांन लेते हैं तो पूर्ण समर्पण हो जाते हैं तथा जाती पाती से ऊपर उठकर अपना और पराया त्याग कर सिर्फ उसी में अपने को समर्पित कर देते हैं और वह भी आपका हो जाता है तो यह पूर्ण समर्पण का लक्षण होता है और आप परम परमात्मा को पा जाते हैं।
दुधेलाल साहू जी ने जिज्ञासा रखी थी
जेहि ते नीच बड़ाई पावा,
सो प्रथमहि हती ताहि नसावा,
धूम अनल संभव सुन भाई,
तेहि बुझाव घन पदवी पाई,
इस पर प्रकाश डालने की कृपा हो भगवन,रामचरितमानस के इन चौपाइयों के स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि यहां पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने सँग और कुसंग की बहुत अच्छी व्याख्या की है तुलसीदास जी कहते हैं कि नीच मनुष्य जिससे ऊपर जाता ,हैँ वह सबसे पहले उसी का नाश करता है। अतः हमें ऐसे व्यक्तियों से बिल्कुल सावधान रहना चाहिए आगे गोस्वामी जी कहते हैं कि हे भाई! सुनिए, आग से उत्पन्न हुआ धुआँ मेघ की पदवी पाकर उसी अग्नि को बुझा देता है,इसीलिए अच्छे व्यक्तियों का ही सँग करना चाहिए।
इस प्रकार आज का ऑनलाइन सत्संग बाबा जी के सु मधुर गणपति भजन के साथ संपन्न हुआ