कालजयी गीत सुन-सुन परभा के दाई के रचयिता स्व.बंगाली प्रसाद ताम्रकार की जयंती मनाई हस्ताक्षर साहित्य समिति ने वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान भी...

कालजयी गीत सुन-सुन परभा के दाई के रचयिता स्व.बंगाली प्रसाद ताम्रकार की जयंती मनाई हस्ताक्षर साहित्य समिति ने वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान भी...

कालजयी गीत सुन-सुन परभा के दाई के रचयिता स्व.बंगाली प्रसाद ताम्रकार की जयंती मनाई हस्ताक्षर साहित्य समिति ने वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान भी...

कालजयी गीत सुन-सुन परभा के दाई के रचयिता स्व.बंगाली प्रसाद ताम्रकार की जयंती मनाई हस्ताक्षर साहित्य समिति ने वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान भी...

दल्लीराजहरा 28 अगस्त।कालजयी कवि एवं साहित्यकार स्व. बंगाली प्रसाद ताम्रकार की जयंती एवं सम्मान समारोह का आयोजन स्थानीय हस्ताक्षर साहित्य समिति के द्वारा एवं सुशील कुमार ताम्रकार के सौजन्य से निषाद भवन में आयोजन किया। कार्यक्रम में अतिथियों एवं वक्ताओं ने स्व. ताम्रकार की देश प्रेम, शिक्षा को लेकर उनके नजरिये को रेखांकित किया।
गरिमामय कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती के चित्र एवं कवि एवं साहित्यकार स्व. बंगाली प्रसाद ताम्रकार के चित्र पर माल्यार्पण कर किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उमा शंकर मिश्रा ने कहा कि मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब स्वर्गीय बंगाली प्रसाद ताम्रकार ने सन् 1982 में हस्ताक्षर साहित्य समिति की नींव रखी थी, तब काफी परेशानी हुई थी। लेकिन उन्होंने कोई परवाह नहीं की और साहित्य की लौ को लेकर निकल पड़े। जब हम उन्हें "दादा" कहते थे तो उस शब्द को लेकर कभी सहमत नहीं हुए ।उनकी सरलता, सहजता की कोई शानी नहीं थी। वे कहते थे- कि कवि और साहित्यकार का मन हमेशा संवेदनशील ,चिंतनशील होता है।

 सरिता गौतम ने कहा कि दादा स्व. बंगाली प्रसाद ताम्रकार साहित्य क्षितिज पर प्रकाश पुंज की तरह है ।गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कवि ,साहित्यकार , चित्रकार शिल्पकार और ना जाने क्या-क्या खूबियां अपने भीतर समाहित किए थे। स्व. ताम्रकार ने अपने जीवन के प्रमुख लक्ष्यों में देशप्रेम एम शिक्षा को ही महत्व दिया। जिन दिनों अपने पैतृक ग्राम धमधा में रहते थे ।तब उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर हाई स्कूल खुलवाने हेतु न केवल एक बड़ी राशि दी बल्कि अपनी महती भूमिका अदा की। स्वर्गीय ताम्रकार के मन में हमेशा यही रहा है कि हर पीढ़ी शिक्षित हो ।शिक्षा की मशाल की लौ प्रकाश बिखेरती रहे।उनका यही भाव हर किसी को अपनी ओर खींचती है।सुश्री गौतम ने स्व.ताम्रकार की एक छत्तीसगढ़ी गीत का पठन किया।रचना के बोल कुछ इस तरह से हैं-

कांटें हैं, वरदान फूल के,
कांटों का अपमान मत करो,
कांटों का अपमान करो तो,
फूलों पर अभिमान मत करो
स्वर्गीय ताम्रकार के सुपुत्र सुशील ताम्रकार ने कहा कि बापू जी का पूरा जीवन संघर्ष और समर्पण के बीच बीता है ।उन्होंने गांधीजी के स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रदूत के रूप में काम किया। स्वतंत्रता आंदोलन के साथ- साथ एक मंजे हुए कवि एवं साहित्यकार थे ।उनकी रचनाओं में सामाजिक बुराइयों को उकेरनी वाली पुट दिखाई देती थी। वरिष्ठ साहित्यकार शिरोमणि माथुर ने कहा कि हस्ताक्षर साहित्य समिति की गठन के दौरान स्वर्गीय ताम्रकार जी का जो सानिध्य मुझे मिला वह मेरे जीवन का स्वर्णिम समय का रहा है ।उस दौरान मुझे बहुत कुछ मिला ।समति के महासचिव घनश्याम पारकर ने कहा कि स्वर्गीय ताम्रकार की साहित्य साधना हमेशा समाज को प्रेरित करने वाली रही है। तथा उनकी रचनाये समाज की दकियानूसी परंपराओं पर कुठाराघात करती रही है। श्रद्धेय दादाजी स्वर्गीय बंगाली प्रसाद की पुत्रवधू श्रीमती मंजूलता ताम्रकार ने कहा कि कार्यक्रम में आकर गौरवान्वित महसूस हो रहा है। किसी भी व्यक्तित्व का आभास उनके जाने के बाद होती है। शायद यही मेरे मन में कोतूहल की तरह गूंज रहा है,मेरा विवाह उनके स्वर्गवास के बाद हुआ। मुझे उनका सानिध्य नहीं मिला। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार लतीफ खान ने स्वर्गीय ताम्रकार के साथ बिताए पलों को साझा किया,और उनकी एक रचना का पठन किया - सुन,सुन परभा के दाईं, सुखदाई तोर मोर जोड़ी हे।

मैं कौन मुंह करवं बड़ाई समारोह में वरिष्ठ कवि चांद मुबारक क़ुरैशी चाँद , ने उनके साथ साहित्य समिति में वर्षों किए कार्यों का विवरण दिया। दादाजी के साथ अपनी यादों को आचार्य महिलांगे ने भी साझा किया।जी. आर . पणिकर ने भी दादाजी के साथ बिताए पलों को याद किया।कार्यक्रम में धर्मैन्द्र श्रवण,आनंद बोरकर, शमीम शिद्दकी, अमित प्रखर, किशोर जैन,राजेश्वरी ठाकुर, टी एस पारकर,संतोष सरल ने काव्यपाठ किया,जिसका भरपूर आनंद श्रोताओं ने उठाया। संचालन अमित प्रखर,आभार घनश्याम पारकर ने व्यक्त किया।


इनका सम्मान किया गया...
कार्यक्रम के दौरान नगर के वरिष्ठ साहित्यकार चांद मुबारक कुरैशी चांद ,गोविंद कुट्टी पणिक्कर, संतोष कुमार ठाकुर सरल को उनके द्वारा किए जा रहे साहित्य साधना में योगदान को मध्य नजर रखते हुए स्व. बंगाली प्रसाद ताम्रकार के पुत्र सुशील ताम्रकार एवं उनके परिजनों की मंशा अनुरूप मुख्य अतिथि उमा शंकर मिश्रा ने साहित्य साधना में लगे तीनो शख्सियतो को श्रीफल, सम्मान पत्र मोमेंटो एवं शाल पहनाकर सम्मानित किया। यादगार इस क्षण का सभी ने करतल ध्वनि से स्वागत किया।इस कार्यक्रम में श्रीराम निषाद,रामेश्वरी कैवल्य,रेखा पारकर ,झमित सहारे,राजेश्वरी मनोज पाटिल, दौलतराम,प्रमिला सरस्वती,कल्याणी,माखन,सहित ताम्रकार जी के परिवार के सभी सदस्य उपस्थित थे।
 

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