दो गज जमीन

दो गज जमीन

दो गज जमीन

लघु कथा
शीर्षक  -  दो गज जमीन


लेखक
पं.श्रीप्रकाश तिवारी " श्रीरंग "
स्व. डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
स्मृति स्वर्ण पदक से सम्मानित 
एवं 
सहायक प्राध्यापक ( गायन )
डॉ.सी.वी.रामन् विश्वविद्यालय करगी रोड कोटा, बिलासपुर छत्तीसगढ़


एक समय की बात है एक गांव में एक दुष्ट आदमी रहता था। उसे जमीन जायदाद बढ़ने का बड़ा ही हवस था। शरीर से तंदरुस्त परंतु दिमाग से पूर्ण रूपेण शून्य ( मूर्ख ) होने के कारण वह बेवजह सबसे लड़ाई करता, सब पर तानाशाही दिखाता, दादागिरी करके सबको परेशान करता, पशुवत दिन भर चरता और पड़ोसियों से बेवजह विवाद करता इत्यादि। 
ये सभी उसके नित्य की दिनचर्या में शामिल था पड़ोसियों को उसकी नीचता पर क्रोध आता पर उसकी मूर्खता एवं अशिक्षा को देखकर कोई भी उससे विवाद कर अपना समय और शांति नष्ट नही करना चाहता था। संयोग की बात ही की एक दिन वह मूर्ख व्यक्ति जंगल में शिकार खेलने गया शिकार खेलते खेलते वह उस स्थान पर पहुंचा जहाँ पर एक साधु की कुटिया थी।साधु बाबा अपनी कुटिया में बैठे नैमेत्तिक  कर्म करके भगवन नाम जप रहे थे। उस दुष्ट व्यक्ति को साधु की कुटिया और तपोवन स्थल पसंद आ गया, वह साधु के निकट जाकर कहने लगा कि "सुनो साधु तुम इस कुटिया और  स्थान को छोड़कर कहीं अन्यत्र चले जाओ क्योकिं यह स्थान मुझे पसंद आ गया है और अब यह स्थान मेरा है"।  साधु बाबा उसकी मूर्खता पर मुस्कुराए और बोले " बेटा यूं तो यह जंगल है और यहां का वातावरण भी ऐसा नहीं है की तुम ज्यादा दिन तक रह सको फिर ऐसा व्यर्थ का अधिकार क्यों कर रहे हो? मूर्ख व्यक्ति बोला "अरे साधु! तू क्या मेरे पराक्रम को नहीं जानता?  जो स्थान मुझे पसंद आ जाता है वह मेरा हो जाता है , और मुझसे लड़ने का जो  दु:साहस करता है उसे मै छोड़ता नही हूँ। साधु बाबा उसकी मूर्खता एवं अहंकार को समझ चुके थे, अतः उन्होंने कहा "बेटा सुनो! ये पूरा तपोवन मेरा है और इसकी एक सीमा 100 कोस दूर जाकर तुम्हारे गांव से मिलता है। ठीक है, मैं ये कुटिया सहित सम्पूर्ण तपोवन तुम्हे देने को तैयार हूँ,पर मेरी एक शर्त है।मूर्ख व्यक्ति बोला "बोल साधु जल्दी बोल ! मेरे लिए कोई बात असंभव नहीं है।" साधु बाबा मुस्कुराए और बोले सुनो बेटा! तुम दौड़कर जितनी दूरी तय करोगे उतने दूर तक की जमीन तुम्हारी होगी, पर  स्मरण रहे कि  दौड़ एक ही बार मे लगाना है। मूर्ख व्यक्ति बोला बस इतनी सी बात। देख साधु अब मै कैसे पूरे तपोवन पर अपना आधिपत्य करता हूँ। ऐसा कहकर वो तेजी से दौड़ना प्रारंभ करता है। ये क्या एक कोस , दो कोस,तीन, चार,....ऐसा करते वह अभी बीस कोस ही दौड़ पाया था  कि उसका दम फूलने लगा, और पच्चीस कोस तक जैसे तैसे पहुंचकर पछाड़ खाकर गिर गया।
दम फूलने से वह अचेत हो गया और पानी पानी कहकर तड़पने लगा।
साधु बाबा उसके पास पहुंचे अपने कमंडल से उसे जल पिलाया और पूछा "बेटा! कितने जमीन पर तुम्हारा अधिकार हुआ ? वो दुष्ट व्यक्ति रोने लगा और बोला "बाबा मै तो सिर्फ दो गज जमीन पर ही कब्जा कर पाया, जितने में मेरा यह शरीर  पड़ा हुआ है, बाकी  मैंने जो दौड़ लगाकर पाना चाहा वो मेरे किसी काम का नही है। क्योंकि अब मै काल के गाल में समा रहा हूँ।" इतना कहकर वह मृत्यु को प्राप्त हो गया।

*भावार्थ* - भावार्थ यह है की ईश्वर ने हमें जितना दिया ही उतने में ही संतुष्ट रहना चाहिए, कभी किसी निर्बल व्यक्ति  को परेशान नहीं करना चाहिए क्योंकि अंत में कुछ काम आने वाला नही है, और न ही कुछ साथ जाने वाला है सब यही छोड़कर जाना पड़ेगा इसी बात को संत कबीरदास जी ने अपने दोहे में कहा है
कि
" कबीरा गर्व न कीजिए ऊंचा देख निवास। 
कल परयो भुई लेटना,ऊपरि जामिहै है घास।।

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