*पंडवानी की अमर स्वर-साधिका डॉ. तीजन बाई का निधन, छत्तीसगढ़ ने खोया अपनी लोकसंस्कृति का अनमोल रत्न*

*पंडवानी की अमर स्वर-साधिका डॉ. तीजन बाई का निधन, छत्तीसगढ़ ने खोया अपनी लोकसंस्कृति का अनमोल रत्न*

*पंडवानी की अमर स्वर-साधिका डॉ. तीजन बाई का निधन, छत्तीसगढ़ ने खोया अपनी लोकसंस्कृति का अनमोल रत्न*
*पंडवानी की अमर स्वर-साधिका डॉ. तीजन बाई का निधन, छत्तीसगढ़ ने खोया अपनी लोकसंस्कृति का अनमोल रत्न*
रायपुर 05 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ की विश्वविख्यात पंडवानी गायिका एवं पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे 27 मई से रायपुर स्थित एम्स में उपचाररत थीं। देर रात करीब 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से पूरे छत्तीसगढ़ सहित देश-विदेश के कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
डॉ. तीजन बाई का जन्म दुर्ग जिले (वर्तमान बालोद क्षेत्र से जुड़ा गनियारी गांव) में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने अपने नाना से महाभारत की कथाएं और पंडवानी गायन सीखा। उस दौर में महिलाओं का पंडवानी गाना प्रचलित नहीं था, लेकिन उन्होंने सामाजिक बाधाओं को चुनौती देते हुए अपनी अद्भुत प्रतिभा से इस लोककला को नई पहचान दिलाई।
तीजन बाई ने कापालिक शैली में पंडवानी की प्रस्तुति देकर देश-दुनिया के दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। उनकी दमदार आवाज, अभिनय, भाव-भंगिमा और तंबूरा के साथ महाभारत के पात्रों का जीवंत चित्रण उनकी विशिष्ट पहचान बन गया। उन्होंने भारत के अलावा एशिया, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में पंडवानी का प्रदर्शन कर छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाया।
उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री (1988), पद्म भूषण (2003) और पद्म विभूषण (2019) से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि, कला शिरोमणि सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें मानद डॉक्टरेट (डी.लिट.) की उपाधि भी प्रदान की गई थी।
डॉ. तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साधना और लोककला के प्रति समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण रहा। उन्होंने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अनेक शिष्यों को प्रशिक्षण देकर इस विरासत को आगे बढ़ाया।
उनके निधन से छत्तीसगढ़ ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर का एक अनमोल रत्न खो दिया है। कला जगत, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों की अनेक हस्तियों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे भारतीय लोककला के लिए अपूरणीय क्षति बताया। डॉ. तीजन बाई अपनी अमर कला, ओजस्वी गायन और लोकसंस्कृति के संरक्षण में दिए गए अतुलनीय योगदान के कारण सदैव लोगों के हृदय में जीवित रहेंगी।

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