*गर्मी की छुट्टियां: नाना-नानी के आंगन में लौटती बचपन की खुशियां, रिश्तों की मिठास और संस्कारों की पाठशाला”*

*गर्मी की छुट्टियां: नाना-नानी के आंगन में लौटती बचपन की खुशियां, रिश्तों की मिठास और संस्कारों की पाठशाला”*

 *गर्मी की छुट्टियां: नाना-नानी के आंगन में लौटती बचपन की खुशियां, रिश्तों की मिठास और संस्कारों की पाठशाला”*
प्रेस विज्ञप्ति
“ *गर्मी की छुट्टियां: नाना-नानी के आंगन में लौटती बचपन की खुशियां, रिश्तों की मिठास और संस्कारों की पाठशाला”* 
गर्मी की छुट्टियां केवल स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई से विश्राम का समय नहीं होतीं, बल्कि यह भारतीय परिवार व्यवस्था, पारिवारिक जुड़ाव और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवंत करने का सबसे सुंदर अवसर भी होती हैं। परीक्षा समाप्त होते ही बच्चों का अपने नाना-नानी, दादा-दादी, मामा-मौसी और रिश्तेदारों के घर पहुंचना हमारी संस्कृति की वह अनमोल परंपरा है, जो पीढ़ियों से रिश्तों को मजबूती प्रदान करती आ रही है।
खरोरा निवासी शिक्षक धीरेंद्र कुमार वर्मा ने कहा कि आधुनिक दौर में जहां युवा वर्ग मोबाइल और डिजिटल दुनिया में अधिक व्यस्त होता जा रहा है, वहीं पारिवारिक परंपराओं से दूरी बढ़ना चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए पढ़ाई जितनी आवश्यक है, उतना ही जरूरी छुट्टियों का आनंद, पारिवारिक मेलजोल, खेलकूद और व्यवहारिक ज्ञान भी है। नाना-नानी के घर बिताया गया समय बच्चों को संस्कार, अपनापन, सहयोग, पारिवारिक जिम्मेदारी और सामाजिक व्यवहार सिखाता है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में उनके घर भी कई रिश्तेदारों के बच्चे छुट्टियां मनाने पहुंचे हुए हैं, जहां सभी बच्चे आपस में हंसी-खुशी, खेलकूद और मस्ती के साथ समय बिता रहे हैं। इस दौरान वे शिक्षक होने के नाते बच्चों को खेल-खेल में शिक्षा, ज्ञानवर्धक गतिविधियों और प्रेरणादायक बातों के माध्यम से पढ़ाई के प्रति भी जागरूक करते रहते हैं, ताकि छुट्टियां मनोरंजन के साथ सीखने का भी माध्यम बनें। धीरेंद्र कुमार वर्मा ने कहा कि छुट्टियां बच्चों के सर्वांगीण विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यह समय केवल आराम का नहीं, बल्कि रिश्तों को समझने, परिवार से जुड़ने, परंपराओं को जानने और जीवन के व्यावहारिक पाठ सीखने का अवसर है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों को छुट्टियों में रिश्तेदारों से जोड़ें, ताकि भारतीय संस्कृति की यह खूबसूरत विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।गर्मी की छुट्टियों में रिश्तों की यह मिठास, बचपन की यह चहक और संस्कारों की यह सीख वास्तव में भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है, जिसे सहेजना हम सभी की जिम्मेदारी है।

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