बेमेतरा:-फाइलों में सिमटा कलेक्टर का औचक निरीक्षण; दफ्तर के कमरों का हुआ दीदार, पर जनता की शिकायतों से रही दूरी

बेमेतरा:-फाइलों में सिमटा कलेक्टर का औचक निरीक्षण; दफ्तर के कमरों का हुआ दीदार, पर जनता की शिकायतों से रही दूरी

बेमेतरा:-फाइलों में सिमटा कलेक्टर का औचक निरीक्षण; दफ्तर के कमरों का हुआ दीदार, पर जनता की शिकायतों से रही दूरी
बेमेतरा:-फाइलों में सिमटा कलेक्टर का औचक निरीक्षण; दफ्तर के कमरों का हुआ दीदार, पर जनता की शिकायतों से रही दूरी

 (थान खम्हरिया तहसील पहुंचीं जिला कलेक्टर प्रतिष्ठा ममगाईं, संवाद के अभाव में निरीक्षण महज औपचारिकता बनकर रह गया।)


मेघू राणा बेमेतरा। जिला कलेक्टर सुश्री प्रतिष्ठा ममगाईं का हालिया थान खम्हरिया तहसील कार्यालय का औचक निरीक्षण प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। कहने को तो यह 'औचक' दौरा व्यवस्था सुधारने के लिए था, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। निरीक्षण के दौरान कार्यालय के कमरों और दस्तावेजों का मुआयना तो हुआ, लेकिन शासन और जनता के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी— 'संवाद' —पूरी तरह नदारद रही।
उम्मीदें लेकर आए थे ग्रामीण, मिला खाली हाथ
लगभग तीन महीने के लंबे अंतराल के बाद कलेक्टर का थान खम्हरिया आगमन हुआ था। खबर मिलते ही क्षेत्र के दूर-दराज गांवों से ग्रामीण अपनी लंबित समस्याओं और शिकायतों की पोटली लेकर इस उम्मीद में पहुंचे थे कि जिले की मुखिया उनकी बात सुनेंगी। लेकिन प्रशासनिक व्यस्तता या जल्दबाजी के चलते कलेक्टर ने जनता से मिलना जरूरी नहीं समझा। ग्रामीण घंटों इंतजार करते रहे और अंत में मायूस होकर लौट गए।
जनप्रतिनिधियों और प्रबुद्धजनों की अनदेखी
हैरानी की बात यह रही कि प्रशासन ने नगर के जनप्रतिनिधियों और प्रबुद्ध नागरिकों से भी किसी तरह की चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा। स्थानीय मुद्दों और विकास कार्यों की जमीनी जानकारी देने के लिए जो वर्ग हमेशा तत्पर रहता है, उसे भी इस दौरे में दरकिनार कर दिया गया। सवाल यह उठता है कि यदि स्थानीय समस्याओं के जानकारों से बात ही नहीं की गई, तो निरीक्षण का वास्तविक उद्देश्य क्या था?
कागजी खानापूर्ति या वास्तविक सुधार?
क्षेत्रीय जनता का मानना है कि केवल कार्यालय के कमरों का चक्कर लगा लेना और फाइलों को देख लेना महज एक सरकारी औपचारिकता है। जब तक अधिकारी जनता के बीच बैठकर उनकी पीड़ा नहीं सुनेंगे, तब तक ऐसे औचक निरीक्षणों का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकलेगा। जनता से दूरी बनाकर किया गया कोई भी प्रशासनिक कार्य केवल 'कागजी विकास' की श्रेणी में आता है।
अहम सवाल:
क्या प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ दफ्तरों के रखरखाव तक सीमित है?
तीन महीने बाद आए अधिकारी के पास आम जनता के लिए समय क्यों नहीं था?
बिना जन-संवाद के किया गया 'औचक निरीक्षण' कितना प्रभावी है?
प्रशासन को समझना होगा कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है। यदि जनता की आवाज ही अनसुनी रह गई, तो अधिकारियों के इन दौरों का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

Ads Atas Artikel

Ads Atas Artikel 1

Ads Center 2

Ads Center 3