प्रेस विज्ञप्ति
*अन्न के साथ नकारात्मक संकल्पों एवं क्रोध का भी करें उपवास - बीके स्वाति दीदी*
20 मार्च 2026, बिलासपुर। नवरात्रि केवल नौ दिनों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धता, संयम और शक्ति के जागरण का पावन अवसर है। इन दिनों माँ दुर्गा की आराधना के साथ-साथ यदि हम अपने संकल्प, बोल और कर्म को भी पवित्र बना लें, तो यही सच्ची नवरात्रि की साधना कहलाएगी।
उक्त विचार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, बिलासपुर की मुख्य शाखा, टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित राजयोग भवन की संचालिका बीके स्वाति दीदी ने नवरात्रि के संदेश के रूप में व्यक्त किए।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि आज के समय में आंतरिक शुद्धता पर ध्यान कम होता जा रहा है। नवरात्रि का वास्तविक संदेश यही है कि हम अपने भीतर छिपी नकारात्मक प्रवृत्तियों—जैसे क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार, द्वेष और कटु वाणी—का त्याग करें। यदि हम अपने संकल्पों में किसी के प्रति बुरा न सोचें, अपने बोल से किसी को दुख न दें और अपने कर्मों से किसी के जीवन में पीड़ा न बढ़ाएँ, तो वही सच्ची देवी-आराधना है।
उन्होंने कहा कि क्रोध मानव जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध के वशीभूत होकर मनुष्य न केवल दूसरों को दुख पहुँचाता है, बल्कि स्वयं की शांति और स्वास्थ्य को भी नष्ट कर लेता है। नवरात्रि हमें यह संकल्प दिलाने का समय है कि हम परिस्थिति कैसी भी हो, अपने मन की शक्ति को पहचानें और क्रोध के स्थान पर शांति, सहनशीलता और समझदारी को अपनाएँ।
बीके स्वाति दीदी ने बताया कि नवरात्रि के नौ दिन आत्मिक अभ्यास के नौ सोपान हैं। पहले दिन आत्म-चिंतन, दूसरे दिन सकारात्मक संकल्प, तीसरे दिन मधुर वाणी, चौथे दिन शुद्ध दृष्टि, पाँचवें दिन क्षमा भाव, छठे दिन सहयोग की भावना, सातवें दिन सहनशीलता, आठवें दिन निस्वार्थ सेवा और नौवें दिन पूर्ण आत्म-शक्ति का अनुभव—यदि इन गुणों को जीवन में धारण कर लिया जाए, तो जीवन स्वतः ही देवी-गुणों से भर जाता है।
उन्होंने आगे कहा कि आज परिवारों और समाज में बढ़ते तनाव, कलह और असंतोष का मुख्य कारण अशुद्ध संकल्प और कठोर बोल हैं। जब हम बिना सोचे-समझे शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो वे तीर की तरह सामने वाले के हृदय को घायल कर देते हैं। नवरात्रि हमें यह शिक्षा देती है कि हम बोलने से पहले विचार करें—क्या मेरे शब्द किसी को दुख तो नहीं देंगे? क्या मेरे संकल्प कल्याणकारी हैं?
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि नवरात्रि में उपवास केवल भोजन का नहीं, बल्कि नकारात्मक सोच, व्यर्थ बोल और गलत कर्मों का उपवास भी होना चाहिए। जब हम मन, वचन और कर्म से पवित्र रहते हैं, तभी सच्ची शक्ति का अनुभव होता है। यही आंतरिक शक्ति हमें हर परिस्थिति में विजयी बनाती है।
अंत में उन्होंने कहा कि यदि इस नवरात्रि हम सभी यह संकल्प लें कि “मैं अपने संकल्प, बोल या कर्म से किसी को भी दुख नहीं दूँगा, क्रोध नहीं करूँगा और शांति व प्रेम का प्रसार करूँगा”, तो यही नवरात्रि का सबसे बड़ा उपवास होगा। ऐसी नवरात्रि न केवल हमारे जीवन को बदल देगी, बल्कि समाज में भी सद्भाव, सौहार्द और शांति की स्थापना करेगी।
ईश्वरीय सेवा में,
बीके स्वाति
राजयोग भवन, बिलासपुर