सरसी छंद
यति १६,११
होली मा रंग लो
उलझन मन ला दहन करें बर, बैठक रखही आज।
काम क्रोध बैठक मा जरही, बरही खस्सू खाज।।
दया क्षमा मन नियाय करही, बस्ती भर सकलाय।
प्रेम प्रसादी सब ला मिलगे , रंग गुलाल उड़ाय।।
अइसन बात धरव श्रोता जन, बदलव अब सब ढंग।
असली रंग रंँगाहूँ सब झन, निकल जाय ये जंग।।
कामी क्रोधी राजा जरगे, नइ बाँचिस हे राज।
प्रहलाद पुत्र कैसे बचगे, सोचव सब झन आज।।
काबर सच्चा भक्ति रिहिस हे, भगवन के अवतार ।
भजन भाव ला हिय मा धरथे, होथे जिनगी पार।।
असली बचथे नकली जरथे, जलके होथे राख।
पापी गगरी मा विष घुलथे, इही चुकाथे साख।।
अत्याचारी भ्रष्टाचारी, भगवन करथे नाश।
दू दिन के जिनगी सँगवारी, महको उपवन काश।।
इही आय मधुबन वृंदावन, गीत भजन गा फाग।
अहंकार के माथा फोड़व, रखव प्रेम अनुराग।।
धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री
राज्यपाल पुरस्कृत व्याख्याता
सेजेस खलारी