*"ब्रह्मा ने जो लिख दिया वह आपको भोगना ही पड़ेगा चाहे लाख चतुराई कर लो कर्म का लेखा मिटाने वाला नहीं है ।" :--- भागवताचार्य पंडित अखिलेश्वरानंद महाराज*

*"ब्रह्मा ने जो लिख दिया वह आपको भोगना ही पड़ेगा चाहे लाख चतुराई कर लो कर्म का लेखा मिटाने वाला नहीं है ।" :--- भागवताचार्य पंडित अखिलेश्वरानंद महाराज*

*"ब्रह्मा ने जो लिख दिया वह आपको भोगना ही पड़ेगा चाहे लाख चतुराई कर लो कर्म का लेखा मिटाने वाला नहीं है ।" :--- भागवताचार्य पंडित अखिलेश्वरानंद महाराज*
*"ब्रह्मा ने जो लिख दिया वह आपको भोगना ही पड़ेगा चाहे लाख चतुराई कर लो कर्म का लेखा मिटाने वाला नहीं है ।" :--- भागवताचार्य पंडित अखिलेश्वरानंद महाराज*
दल्ली राजहरा में यादव परिवार के द्वारा, नौदिवसीय श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह का आयोजन वार्ड क्रमांक 24 चंदेनी भाटा में राधा कृष्ण मंदिर के पास किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के भागवताचार्य पंडित अखिलेश्वरानंद महाराज संतोषी नगर (लखोली ) राजनांदगांव। यह आयोजन परिजन के स्मृति स्व. भवानी राम यादव (पिताजी) एवं स्व. नितेश यादव (छोटे भाई ) की पुण्य स्मृति में वार्षिक श्रद्धा मोक्ष के तहत 04 फरवरी 2026 से 13 फरवरी 2026 तक दोपहर 1:00 बजे से किया जा रहा है। कथा के पांचवें दिन आज भागवत आचार्य ने ध्रुव चरित्र और समुद्र मंथन की कथा बताई । उन्होंने बताया कि राजा
 उत्तानपाद की संतान न होने पर उनकी रानी सुनीति ने दूसरी विवाह करने की राजा को कहा राजा ना चाहते हुए भी रानी की इच्छा का सम्मान करते हुए राजकुमारी सुरूचि से विवाह कर लिया विवाह उपरांत जब उन्हें अपने राजमहल लेकर आता है तब रानी सुनीति खुशी होकर सुरुचि का स्वागत करने आरती का थाली लेकर राजमहल से नीचे आती है उसे देखकर सुरुचि कहती है कि राजन यह कौन है राजा उत्तानपाद उन्हें बताया कि यह महल की पहली रानी सुनीति है तब वह कहती है कि राजन आपको पता नहीं है एक म्यान में दो तलवार नहीं हो सकता अगर यह इस महल में रहेगी तो मैं यहां नहीं
 रहूंगी मुझे अपने मायके पहुंचा दो राजा ने यहां सुनकर अब जाकर आ जाता है तब स्थिति को भापकर रानी सुनीति राजन को बुलवाती है और ऊंचाई कहता है इक कि और कहती है कि राजन क्या बात है ।राजन कहते हैं की सुनीति नहीं चाहती कि आप इस राजमहल में रहो । महारानी सुनीति कहती है कि राजन मैं जैसे भी रह लूंगी लेकिन इस महल को वंश की , चिराग जलाने वाले की आवश्कता है जिससे राजवंश चलेगा 
 मैं राजमहल छोड़ने के लिए तैयार हूं राजन फिर जाकर रानी सुरुचि को बताती है कि सुनीति राजमहल छोड़ने को तैयार है । तब वह कहती है कि ऐसे नहीं महाराज । मैं डोली से तभी उतरूंगी जब सुनीति राजमहल के सबसे फटे पुराने कपड़े पहन कर राजमहल को छोड़कर बाहर रहेगी और प्रतिदिन यहां डंडा लेकर आएगी और छत पर बैठने वाले पक्षियों को डंडे से भगाएगी । तभी मैं राजमहल में रहूंगी । राजन रानी सुनीति की बात को सुनकर अचरज में पड़ जाता है यह एक नारी का दूसरे नारी के प्रति कैसा सम्मान है । एक नारी जो बहुत पहले से इस महल में रह रही है और नए आने वाले रानी इस तरह से उनकी सम्मान कर रही है ।
  महारानी सुनीति उनकी मांग को सहर्ष स्वीकार करती है जो मेरी किस्मत में लिखा है वह मुझे सहर्ष स्वीकार है इस राजमहल को वंश की आवश्यकता है मैं इनकी मांग को सहर्ष स्वीकार करती हूं कहकर वह राजमहल से पुराने कपड़े पहनकर निकलने लगी उसे देखकर रानी सुरुचि कहती है कि राजमहल छोड़कर फटे कपड़े पहन कर तो जा रहे हो लेकिन सोने के आभूषण किस काम का । जितनी भी आभूषण तुम्हारे शरीर में है पूरे उतार कर जाओ । रानी उनकी बातों को मानकर सभी स्वर्ण आभूषण वहीं छोड़कर एक भिखारी के रूप में राजमहल छोड़कर बगीचे में रहने चली जाती है । रानी सुनिचि की स्थिति देखकर राजा के आंसू में आंखों में आंसू बहने लगता है राजा विवश हो जाते है। रानी सुनीति रोते हुए चली जा रही है राजा उसे देखते जाता है जब तक उनकी आंखों से ओझल नहीं हो जाती है । इधर रानी सुनीति डोली से उतरती है और आनंदपूर्वक राजमहल में रहने लगती है । 
इधर महारानी सुनीति जो रानी थी आज अपने सौतन की वंश चलाने की चाह में भिखरन बन गई और रोज पक्षी है हकालने महल में आती और शाम को चली जाती । जब जाती तो भीख मांगते हुए जाती राज्य की जनता देख कर उनसे कहती । महारानी आप भीख मत मांगो आपको जो भी चाहिए हम लोग आपके कुटिया तक पहुंचा देंगे । रानी कहती मेरी जो किस्मत में लिखा है वह मुझे भोगने दीजिए पहले राजमहल का सुख लिखा था और आज मुझे भी भिखारण बनना लिखा है ।
यह सच बात है भक्तों जिनके किस्मत में विधाता ने जो लिख दिया है उसको मिटाने वाला कोई नहीं है यदि आपको राजा बनना लिखा है तो आप राजा बनेंगे और यदि आपको भिखारी बनना लिखा है तो आप भिखारी बनेंगे ब्रह्मा ने जो लिख दिया वह आपको भोगना ही पड़ेगा लाख चाहे चतुराई कर लो लेकिन कर्म का लिखा मिटाने वाला नहीं है । आपको इसे भोगना ही पड़ेगा । महारानी सुनीति ने वंश चलाने और बेटा पानी के लिए क्या से क्या बन गई वह भी अपने सौत के बेटा के लिए । 
ऐसी होती है नारी की तपस्या और बलिदान की कहानी जहां एक और रानी सुनीति वंश चलाने के लिए बलिदान दे रही है वहीं दूसरी ओर रानी सुरुचि अपना आधिपत्य और अधिकार जमाने के लिए रानी सुनीति को महलों से बाहर निकाल कर कष्ट दे रही है ।
 उन्होंने बताया कि मां अपने संतान पाने के लिए इधर-उधर जहां-तहां भटकती है कभी इस मंदिर तो कभी उसे मंदिर लेकिन क्या कभी सोचा है जिस बच्चों को 9 महीने तक आपने पाल बड़ा किया क्या गारंटी है वही बेटा जन्म के बाद आगे साथ देगा ..,?बेटा जन्म के बाद आगे सुख देगा क्या गारंटी है इसकी कोई गारंटी नहीं है लेकिन मां खून की एक एक बूंद से उस बालक को सींचता है लेकिन आज के बेटा नालायक निकल रहा है अपनी मां को डंडा मार रहा है और घर से बाहर निकल रहा है । अपने जन्म देने वाले मां पिता को अनाथ आश्रम में छोड़ रहा है जिस मां ने धरती पर उनको लाया है वे मां बाप का सेवा नहीं करते उन्हें इतना दुख देते हैं उन्हें विद्या आश्रम में ले जाकर छोड़ देते हैं परमात्मा को नहीं मानना है तो मत मानो लेकिन जिसने आपको जन्म दी है उनको मानो,मां-बाप से बढ़कर कोई दुनिया में भगवान नहीं है ।मां-बाप है तब तक खूब सेवा कर लो नहीं तो जीवन भर पछताते रहोगे वह किस्मत वाला है जिनके मां-बाप रहते हैं बेटी की किस्मत उसी दिन फूट जाती है जिस दिन बाप मर जाता है और बेटे की किस्मत उसे दिन फट जाती है जब उनके मां मर जाती है क्योंकि बेटे को मां से ज्यादा प्रेम होता है और बेटी को पिता से ज्यादा प्रेम होता है । उस दिन बेटा अनाथ हो जाता है जब मां मरती है और जिस दिन पिता मरता है उसे दिन बेटी अनाथ हो जाती है ।

 रानी सुरुचि राजा से यह भी दबाव बनाया देखो रानी सुनीति से मिलने के लिए तुम्हें नहीं जाना है लेकिन राजा महारानी सुनीति से मिलने चोरी छुपे जाने लगा इसी बीच खबर आती है की रानी सुनीति गर्भवती हो जाती है और कुछ समय बाद राजा को यह खबर मिलता है की रानी सुरुचि भी गर्भ धारण कर लेती है राजा भगवान से कहता है हे भगवान यही अगर कुछ समय पहले हुआ रहता तो मुझे आज यह दिन देखने को नहीं मिलता । लेकिन समय चक्र के आगे राजा विवश था। इधर महारानी सुनीति सुंदर पुत्र को जन्म देती है जिसका नाम रखता है ध्रुव और कुछ समय उपरांत रानी सुरुचि भी एक पुत्र को जन्म देती है जिसका नाम रखता है उत्तम । इधर ध्रुव और उधर उत्तम दोनों अपने मां के पास पल रहे हैं राजा आनंदित हैं कि मेरे दोनों बेटे हैं।इधर महारानी सुरुचि को यह जानकारी मिलने मन ही मन दुखी होती है कि राजा का जब चयन करने की बात आएगी तो ध्रुव को ही राजा बनाया जाएगा । तब वह कई बार ध्रुव को मारने के लिए कई बार प्रयास करती है । लेकिन वह सफल नहीं हो पाती एक दिन रानी सुनीति छत पर पक्षियों को भागते रहती है इधर खेलते खेलते ध्रुव और उत्तम राजा के गोदी में जाकर बैठ जाते हैं सुरुचि देखी है तो ध्रुव के गाल पर एक चांटा मारती है और खींचकर राजा की गोदी से ध्रुव को उतार देती है जब सुनीति आवाज सुनती है तो दौड़कर नीचे आती है कि मेरे बेटे को किसने मारा ध्रुव रोते हुए रानी सुनिति को कहती है की मां क्या मेरा यह पिता नहीं है तब रानी सुनीति उन्हें बताती है कि इस दुनिया में और भी है जो सबका पिता है तुम उसकी तपस्या करो और उसकी गोद में बैठो । बालक ध्रुव उस परमपिता को प्राप्त करने के लिए जंगल के रास्ते में निकल जाता है उनके पैर छिल जाते हैं कांटे और पत्थर से ध्रुव गिर पड़ते हैं । लेकिन उनकी मन की लगन उन्हें परमात्मा की खोज में जाने से नहीं रोक पाता वह जब जंगल के रास्ते निकलते हैं ।तब देवर्षि नारद उन्हें मिलते हैं और रोकते हैं कि इतने कम उम्र में तुम जंगल ना जाओ यह तुम्हारी उम्र नहीं है तुम्हारी उम्र खेलने कूदने की है । तब ध्रुव कहते हैं कि देवर्षि नाराज अपने जिनको भी रास्ता बताया उन्होंने भगवत प्राप्ति किया है और आप मुझे रोक रहे हो मुझे रास्ता बताइए जिससे मैं परमपिता परमात्मा की गोद में बैठ सकूं उन्हें प्राप्त कर सकूं मुझे उनके प्राप्ति हो जाए ।

महाराज जी ने बताया कि हमको परमात्मा को प्राप्त करना है तो हमारे मन में आग लगने चाहिए परमात्मा को प्राप्त करने की आग उसी तरह होनी चाहिए जैसे मछली जल से निकलने के बाद उछल कूद करती है परमात्मा को प्राप्त करने के लिए इस तरह मन में तड़प होनी चाहिए । कबीर दास जी कहते हैं कि एक अचंभा हमने देखा कुएं में लग गई आग कूड़ा करकट जल गया मछली खेल फाग  
मन के क्रोध और अहंकार सबको जलाकर आप परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं । नारद मुनि ने ध्रुव के हठ के आगे झुकते हुए उन्हें ओम नमो भगवते वासुदेवाय का मंत्र दिया ध्रुव जंगल में जाकर कठोर तपस्या किया अंत में उन्हें भगवान विष्णु की प्राप्ति हुई । उन्हें कल्प वर्ष तक राज्य करने का आशीर्वाद मिला ।
उनके आशीर्वाद से वे वरदान प्राप्त करके वापस आए जब ध्रुव की वापसी की खबर सुनी तो दोनों मां दौड़कर आए लेकिन ध्रुव ने सबसे पहले अपनी छोटी मां सुरुचि को प्रणाम किया कि आपके कारण ही मुझे भगवान की प्राप्ति हुई है कालांतर में ध्रुव और उत्तम दोनों राजा बने और राज सुख भोगे।

Ads Atas Artikel

Ads Atas Artikel 1

Ads Center 2

Ads Center 3