घोषणा 15 दिन की, पोर्टल 90 दिन का! आखिर सच क्या है?(गोपाल शर्मा)

घोषणा 15 दिन की, पोर्टल 90 दिन का! आखिर सच क्या है?(गोपाल शर्मा)

घोषणा 15 दिन की, पोर्टल 90 दिन का! आखिर सच क्या है?(गोपाल शर्मा)
घोषणा 15 दिन की, पोर्टल 90 दिन का! आखिर सच क्या है?
(गोपाल शर्मा)
मेघू राणा बेमेतरा।छत्तीसगढ़ में डिजिटल गवर्नेंस के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने पूरे प्रदेश में “ऑटो-डाइवर्ज़न” सुविधा लागू करने की घोषणा करते हुए कहा कि अब भूमि उपयोग परिवर्तन (डायवर्ज़न) के मामलों में 15 दिनों के भीतर निर्णय अनिवार्य होगा और यदि अधिकारी तय समय में आदेश जारी नहीं करेंगे तो 16वें दिन प्रमाणपत्र स्वतः जारी हो जाएगा।
सरकार ने इसे सुशासन, पारदर्शिता और डिजिटल क्रांति की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। पोस्टर, बैनर, सोशल मीडिया और प्रचार अभियानों में 15 दिन की समय-सीमा का जोरदार प्रसार किया गया।
लेकिन जब नागरिक विभागीय पोर्टल पर आवेदन करने पहुंचे, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आई।
उसी पोर्टल पर डायवर्ज़न की समय-सीमा अब भी 90 दिन (3 माह) दर्शाई जा रही है।
अब सवाल उठता है —
क्या 15 दिन वाला दावा सिर्फ प्रचार तक सीमित है?
क्या पोर्टल अपडेट नहीं हुआ या नियम ही लागू नहीं हुआ?
अगर 16वें दिन ऑटो-डाइवर्ज़न का दावा सही है तो पोर्टल पर 90 दिन क्यों लिखा है?
और अगर 90 दिन ही सही है तो जनता को 15 दिन का सपना क्यों दिखाया जा रहा है?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक किसी नियम में बदलाव का स्पष्ट राजपत्र प्रकाशन न हो, तब तक पुरानी समय-सीमा ही प्रभावी मानी जाती है। ऐसे में घोषणा और जमीनी हकीकत के बीच यह अंतर कई सवाल खड़े कर रहा है।
डिजिटल सुशासन का दावा तभी सार्थक होगा जब घोषणा और व्यवस्था में समानता हो। फिलहाल नागरिक असमंजस में हैं — भरोसा किस पर करें? भाषण पर या पोर्टल पर?

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