*यूजीसी के नए नियमों में जनरल कैटेगरी छात्रों के खिलाफ रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया – डॉ. प्रतीक उमरे*
*यूजीसी के नए नियमों में जनरल कैटेगरी छात्रों के खिलाफ रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया – डॉ. प्रतीक उमरे*
दुर्ग नगर निगम के पूर्व एल्डरमैन भाजपा नेता डॉ. प्रतीक उमरे ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा लागू की गई प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026 की कड़ी निंदा की है।डॉ. प्रतीक उमरे ने कहा कि ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के नाम पर जनरल कैटेगरी छात्रों पर होने वाले भेदभाव,जिसे रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन कहा जा रहा है को पूरी तरह नजरअंदाज करते हैं।यह न केवल संवैधानिक समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है बल्कि उच्च शिक्षा प्रणाली में एक नई विभाजनकारी प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है।यूजीसी का यह नया नियमावली एकतरफा और पक्षपाती है।इसमें एससी/एसटी/ओबीसी छात्रों के खिलाफ भेदभाव रोकने के लिए सख्त प्रावधान हैं जो स्वागतयोग्य हैं।लेकिन जनरल कैटेगरी के छात्रों पर होने वाले भेदभाव जैसे आरक्षण नीतियों के कारण सीटों,छात्रवृत्ति और अवसरों में असमानता को पूरी तरह अनदेखा किया गया है।यह रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन है,जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव निषेध) का स्पष्ट उल्लंघन करता है।क्या समानता का अर्थ केवल एक समुदाय को लाभ पहुंचाना है?जनरल कैटेगरी के लाखों छात्रों का भविष्य इस असमानता से प्रभावित होगा।नियमावली में इक्विटी कमिटी का गठन अनिवार्य है जिसमें एससी/एसटी/ओबीसी,महिलाओं और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व जरूरी बताया गया है।लेकिन जनरल कैटेगरी के छात्रों या शिक्षकों का कोई अनिवार्य प्रतिनिधित्व नहीं है।इससे कमिटी पक्षपाती हो सकती है और रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन की शिकायतों को दबाया जा सकता है।उन्होंने कहा कि पुराने यूजीसी नियमों में फर्जी शिकायत करने वालों के लिए सजा का प्रावधान था,लेकिन नए नियमों में इसे हटा दिया गया है।डॉ. प्रतीक उमरे ने चेतावनी दी कि इससे कैंपस में फर्जी केसों का बोलबाला हो सकता है,जो निर्दोष जनरल कैटेगरी छात्रों के करियर को नुकसान पहुंचाएगा।छोटी-मोटी बातों पर भी डर का माहौल बनेगा जो पढ़ाई को प्रभावित करेगा।आरक्षण प्रणाली के कारण जनरल कैटेगरी छात्रों को उच्च कट-ऑफ,सीमित सीटें और अवसरों की कमी का सामना करना पड़ता है।यूजीसी ने 2020-2025 के बीच भेदभाव की शिकायतों में वृद्धि का हवाला दिया है,लेकिन केवल आरक्षित वर्गों पर फोकस किया।जनरल कैटेगरी के छात्रों पर होने वाले भेदभाव की कोई रिपोर्टिंग या निवारण तंत्र नहीं है।डॉ. प्रतीक उमरे ने कहा कि यह डीईआई (डाइवर्सिटी, इक्विटी, इंक्लूजन) का भारतीय संस्करण लगता है,जो वास्तव में जातिवाद को बढ़ावा दे रहा है न कि समाप्त कर रहा है।उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से आग्रह किया कि इस मुद्दे पर तत्काल ध्यान दिया जाए।उच्च शिक्षा को समावेशी बनाना आवश्यक है लेकिन किसी एक वर्ग को दूसरे के खिलाफ हथियार बनाकर नहीं।