तिल्दा नेवरा।
दिलीप वर्मा
*भगवान में मन लगाने से आनंद मिलेगा-स्वामी इंदुभवानंद तीर्थ जी*
तिल्दा नेवरा के समीप ग्राम पंचायत सरोरा गोसदन में चल रहे शतचंडी महायज्ञ के साथ मां शीतला मंदिर प्रांगण में चल रहे श्री मद्भागवत कथा के तीसरे दिन यति प्रवर पूज्य दण्डी स्वामी डाक्टर श्री इंदुभवानंद तीर्थ जी महाराज शंकराचार्य आश्रम रायपुर ने कहा कि राजा परीक्षित जी ने परमहंस श्री शुकदेव जी से पूंछा कि जो मरने वाला है उसे क्या करना चाहिए ? तब परमहंस श्री शुकदेव जी प्रसन्न हो गए क्योंकि यह प्रश्न लोक कल्याण के लिए था। कहने लगे कि लोगों की रात सोने में और भोग में बीत जाती है और दिन धन कमाने में ऐसे ही जीवन व्यर्थ चला जाता है। बुद्धिमान मनुष्य को हर समय भगवान के नाम, रुप, लीला और धाम के जप, ध्यान, चिंतन और धामवास के द्वारा जीवन को सफल बनाना चाहिए। हमेशा भगवान के नाम का जाप करें
भगवान की कथा सुने। जो भगवान का नाम लेकर मर जाते हैं उनका कल्याण हो जाता है। परमहंस श्री शुकदेव जी ने कहा कि मैं समाधि में था भगवान के गुणों ने मेरे मन को खींच लिया और मैं समाधि छोड़कर भागवत पढ़ने लगा। तुम भी भगवान की कथा सुनो उनके नाम का जाप करो रुप का ध्यान करो तुम्हारे पास तो सात 7 दिन है राजा खटवांग का तो दो घड़ी में कल्याण हो गया था त्याग के द्वारा। ब्रह्मा जी ने चार श्लोक में भागवत का वर्णन किया है पहले ब्रह्म का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जो पहले भी था आज भी है और कल भी रहेगा आदि में है अंत में भी रहेगा वो सनातन है परब्रह्म है। जो मध्य में रहे वो संसार है माया है, जो है उसे छिपा दे जो नहीं है उसे दिखा दे वो माया है। जो माया और अविद्या से युक्त है वो जीव है।
महाभारत युद्ध के पूर्व धर्मराज श्री युधिष्ठिर जी शांति के लिए भगवान को भेजते हैं उस शांति प्रस्ताव को दुर्योधन ने अस्वीकार कर दिया। श्री विदुर जी सबकुछ छोड़कर चले जाते हैं उनकी महर्षि मैत्रेय जी से ज्ञान चर्चा होती है कि सुख प्राप्त करने के लिए संसार के सभी प्राणी लगे हैं फिर भी दुःख पाते हैं क्योंकि संसार दुःखालय है यहां मन लगाने से दुःख ही मिलेगा। भगवान् आनंद के सागर हैं यदि हम भगवान में मन लगायेंगे तो आनंद मिलेगा सुख मिलेगा।
कुंती स्तुति का वर्णन करते हुए कहा कि माता कुंती ने दुःख मांगा क्योंकि दुख में भगवान साथ रहते हैं अर्थात माता कुंती ने भगवान का साथ मांगा है भगवान से कहती हैं कि मेरा मन परिवार से हटकर आपके चरणों में लगे। पितामह भीष्म जी ऐसे महाभागवत हैं जिन्हें दर्शन देने भगवान स्वयं गये भगवान की स्तुति करते दर्शन करते रास का स्मरण करते भगवान में लीन हो गए। ब्रह्मा जी के भौं से रुद्र उत्पन्न हुए जो दुष्टों को रुलाये वो रुद्र हैं। ब्रह्मा जी के नाक से भगवान श्री वराह का अवतार हुआ जिन्होंने पृथ्वी का उद्धार किया और हिरण्याक्ष का वध करके तार दिया। वराह अवतार की कथा सुनने से ब्रह्महत्या जैसे पाप नष्ट हो जाता है।
ध्रुव जी के चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि ध्रुव जी की विमाता सुरुचि ने अपमान किया था माता सुरुचि की प्रेरणा से तपस्या कर भक्त ध्रुव जी के भगवान श्री विष्णु जी का दर्शन किया। इस कथा के माध्यम से शिक्षा मिलती है कि वह अपमान भी धन्य है जो भगवान से जोड़ दे।
डी डी अग्रवाल जी ने सपरिवार आरती की मंदिर समिति के सदस्य गण और ग्राम वासियों ने माल्यार्पण कर स्वागत किया। मिडिया प्रभारी रवि सिंह ठाकुर और रिपुसूदन महराज ने जानकारी दी है।