देव भाषा संस्कृत के पठन-पाठन एवं श्रवण करने मात्र से हृदय को मिलती है शीतलता और पवित्रता:संत राम बालक दास

देव भाषा संस्कृत के पठन-पाठन एवं श्रवण करने मात्र से हृदय को मिलती है शीतलता और पवित्रता:संत राम बालक दास

देव भाषा संस्कृत के पठन-पाठन एवं श्रवण करने मात्र से हृदय को मिलती है शीतलता और पवित्रता:संत राम बालक दास

 देव भाषा संस्कृत के पठन-पाठन एवं श्रवण करने मात्र से हृदय को मिलती है शीतलता और पवित्रता:संत राम बालक दास

           बालोद जिला के पाटेश्वर धाम के संत श्री बाल योगेश्वर महात्यागी राम बालक दास जी के द्वारा उनके सत्संग व्हाट्सएप ग्रुप में प्रतिदिन ऑनलाइन सत्संग का आयोजन किया जाता है सभी लोग इसमें जुड़ कर अपनी विभिन्न प्रकार की समसामयिक, धार्मिक, वैज्ञानिक, पारिवारिक आदि अनेक विषयों पर जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते हैं।

              सत्संग में प्रतिदिन अपर्णा, पुरुषोत्तम अग्रवाल जी,डूबाबती यादव, राजकुमार यादव जी, दाता राम साहू जी, रामफ़ल जी,शिवाली साहू,तनु साहू,भूषण साहू जी अपने परिवार के साथ रामचरितमानस की विभिन्न पंक्तियों का गीता गायन, विभिन्न भजनों के साथ जुड़ते हैं एवं सत्संग को सुमधुर बना देते हैं,आनंद तब दोगुना हो जाता है जब सत्संग में बाबा जी के सु मधुर भजन की प्रस्तुति की जाती है।

               आज संस्कृत भाषा के महत्व को बताते हुए बाबाजी ने बताया कि,प्रतिदिन सत्संग में भक्तों के द्वारा संस्कृत के श्लोक स्तुति मंत्र भजनों की प्रस्तुति अद्भुत है और संस्कृत भाषा ही ऐसी है जिसके सुनने मात्र से शीतलता प्राप्त होती है क्योंकि यह देव भाषा है, जिस प्रकार से एक बच्चे की तोतली भाषा को सुनकर मन में आनंद,अलहाद,प्रेम शांति मिलती है और अपने आप ममता का भाव जागृत हो जाता है, उसी प्रकार संस्कृत के श्लोकों को पढ़ना सुनना कहना हमारे अंदर देवीय भावों को जगाता है,इसलिए हमें पूर्ण प्रयास करना चाहिए कि हम अधिक से अधिक संस्कृत का श्रवण करें एवं वाचन एवं गायन करें अपने छोटे बच्चों को भी संस्कृत अवश्य रूप से सिखाई जानी चाहिए आज की सत्संग परिचर्चा में रामफल जी ने जिज्ञासा रखी की ।
         
               इस श्रावण मास में कांवड़ यात्रा की विशेष महत्व क्यों है इस पर प्रकाश डालने की कृपा हो, कावड़ यात्रा पर प्रकाश डालते हुए बाबा जी ने बताया कि सावन मास में कावड़ यात्रा का बहुत अधिक महत्व है यह हमारी प्राचीन सभ्यता है, और इसका इतिहास भी प्राचीन है भगवान भोलेनाथ के परम भक्त हुए परशुराम, जो भगवान विष्णु के अवतार थे, उन्होंने ही सर्वप्रथम श्रवण मास में कावड़ यात्रा का प्रारंभ किया, 1960 में भी कावड़ यात्रा का इतिहास मिलता है जब पुरुषों ने ही नहीं महिलाओं ने भी कावड़ यात्रा हरिद्वार से निकाली थी,कावड़ यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि कहा जाता है कि श्रवण कुमार ने कावड़ में बैठाकर अपने माता पिता को तीर्थ यात्रा करवाई थी,उन्होंने उत्तराखंड के हरिद्वार में माता-पिता को गंगा स्नान कराया और वहां का गंगाजल जाकर कावड़ द्वारा रामेश्वरम में भोले बाबा का अभिषेक किया।

              दाताराम साहू जी ने जिज्ञासा रखी की नवधा भक्ति के आठवें भक्ति,आठवं जथालाभ संतोषा।सपनेहुं नहिं देखइ परदोषा।। इस पर प्रकाश डालने की कृपा करें, बाबा जी ने बताया कि यह भक्तों की परिपक्वता की स्थिति है जब वह स्थिरता की और होता है तब भगवान राम ने इस स्थिति का वर्णन शबरी से किया,जब भक्ति करते करते विषय और मोह से मन ऊबने लगता है तो भक्त संतुष्टि की और हो जाता है, जो है उसमें खुश रहना, और जो नहीं मिला उसका कोई दुख नहीं, हर चीज मिथ्या लगने लगती है,इस आठवीं भक्ति में संसार का जो सत्य उसका भान होने लगता है और जीव परमहंस हो जाता है, उनके लिए ना कोई बुरा होता है ना ही कोई भला जो भी बुराई है मुझ में है।

                 आज का मीठा मोती में ऋचा बहन के द्वारा संदेश दिया गया कि " अनजाने में किये गए अच्छे और बुरे कर्मो का फल मिलता ही है  इसलिए हर बार कर्म को सोच कर करे।"

             इस पर अपने विचार रखते बाबा जी ने बताया कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि कर्म की गति गहन है इसलिए अनजाने में भी किए गए कार्य का फल मिलता है इसी लिए सोच विचार कर ही हर कार्य करें।

             इस प्रकार आज का सत्संग बाबा जी के मधुर भजन "अमृत की बरसे बदरिया....... के साथ संपन्न हुआ  इस ऑनलाइन सत्संग में प्रतिदिन जुड़ने हेतु आप श्री पाटेश्वर धाम के नंबर 94255 10729 पर अपना नाम पता लिखकर भेजें आपका नंबर सत्संग में जोड़ दिया जाएगा।

       जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम

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