यम का गम
व्यंग्य
लेखक
पं.श्रीप्रकाश तिवारी "श्रीरंग"
स्व. डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
स्मृति स्वर्ण पदक से सम्मानित
एवं
सहायक प्राध्यापक (गायन)
डॉ.सी.वी.रामन् विश्वविद्यालय करगी रोड कोटा, बिलासपुर
छत्तीसगढ़
बात उन दिनों की है जब कोरोना महामारी की दूसरी लहर तबाही मचा रहा था,लॉक डाउन लगने ही वाला था जिसके कारण अति आवश्यक कार्य को पूर्ण करने के उद्देश्य से मै शहर की ओर निकला और सब काम निपटा कर घर लौटने लगा तभी अचानक देखा कि सरकारी चिकित्सालय के सामने एक विशालकाय शरीर वाला व्यक्ति जो पास ही चाय ठेले के टूटे टेबल पर अपना वजन सम्हाल के, हल्की सी निद्रा अवस्था में बैठा हुआ था, जो बार बार शहर की गन्दी नाली में पनपे मच्छर के काटने पर परेशान हो उठ जाता और फिर से आँख बंद करके अपनी थकान को कम करने का असफल प्रयास करता। मेरा पूरा ध्यान उस विशालकाय व्यक्ति पर केन्द्रित हो गया। आजू-बाजू देखने पर उनके बगल में एक गदा और एक काली रस्सी पड़ी हुई थी मुझे समझ नहीं आ रहा था की आखिर ये शख्स है कौन? क्योकिं इससे पहले मैने ऐसा व्यक्ति टी.वी.पर रामायण महाभारत सिरियल के अलावा कही भी नही देखा था।
पास जाकर मैंने उन्हें प्रणाम किया और उनसे उनकी खिन्नता का कारण पूछा। पहले तो वे मुझ पर जोर से झुंझलाये पर बार बार मेरी उत्सुकता को देखकर उनके भी मन में मेरे से बात करनी की इच्छा हुई।
उनका परिचय सुनकर मै जोर से हँसा पड़ा और कहने लगा की महाराज इतने बड़े शहर में मै ही मिला हूँ आपको मजाक करने के लिए।
पर जब उन्होंने मेरा नाम, गाँव, पता,परिवार सबकी सटीक जानकारी दी तब मेरे तो पैरो तले जमीन ही खिसक गये, लग रहा था की मानो मै कोई सपना देख रहा हूँ ये तो सचमुच महाराज यमराज थे, वही यमराज जिनके नाम से तीनो लोक कांपता है पर वो आज भू लोक पर और वो भी बड़ी बिचित्र अवस्था में? ये क्या मूंछो पर ना कोई ताव, चेहरे में खिन्नता का भाव, मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था । फिर भी मैंने हाथ जोड़कर हिम्मत करते हुए उनसे भू लोक में आने और इस तरह विचित्र अवस्था में घूमने का कारण पूछा महाराज कुछ बोल पाते तभी उनके पास एक और महाशय आकर कहने लगे की उस दुकान का मानव बड़ा हठी है उसने बिना पैसे के पेन देने से मना कर दिया।ऐसा किया सो किया उपर से कुछ अपशब्द भी कहा । मैंने महाराज यम से पूछा कि ये श्रीमान जी कौन है ?
महाराज यमराज ने परिचय देते हुए कहा कि ये हमारे
P. A. हैं।
मैंने पूछा P. A.?
उन्होंने कहा हां हां P. A. बोले तो ये महाराज चित्रगुप्त है।
तब मैंने महाराज चित्रगुप्त को प्रणाम कर उनसे पेन खरीदने का कारण जानना चाहा। उन्होंने कहा कि भूलोक में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से उनके दवात की स्याही सूख गई है जिसके चलते उन्हें व्यक्तियों के लेखा-जोखा लिखने में तकलीफ हो रही है मैंने मुस्कुरा कर उन्हें अपना पेन दिया जिससे उनके चेहरे पर एक छोटी सी प्रसन्नता झलक उठी ठीक उसी तरह जिस प्रकार कोई बालक मनचाहा वस्तु पाकर प्रसन्न हो जाता है।
महाराज चित्रगुप्त ने मुझे शुद्ध अंग्रेजी में थैंक्यू कहते हुए कहा की मानव आज तुमने मुझे सस्पेंड होते-होते बचा लिया। इस भूलोक में आज मेरी नौकरी जाते-जाते बच गयी। मैंने कहा महाराज आप भी अब कहां इन पुराने पद्धति में लगे है आपको लैपटॉप जैसी नयी तकनीक का प्रयोग करना चाहिए उन्होंने अपने झोली से लैपटॉप निकालकर मुझे दिखाया और कहने लगे कि - मानव जिस दिन हम भूलोक पर आए उसी दिन हमने सबसे पहले लैपटॉप खरीदा परंतु कुछ दिनों बाद लैपटॉप डिस्चार्ज हो गया हम इसे चार्ज करने के लिए बस स्टॉप पर लगे चार्जर पॉइंट पर गये और चार्ज पर लगाया पर यह चार्ज ही नहीं हुआ। हमें लगा कहीं हमारा लैपटॉप तो खराब नहीं हो गया क्योकिं उस पर मैड इन चाइना जो लिखा था पर कोरोना को याद कर मन में तसल्ली मिली कि चाइना ने आज कल प्रोडक्ट टिकाऊ बनाना शुरू कर दिया है। गहन परीक्षण करने पर पता चला कि बस स्टैंड पर नगर निगम ने केवल चार्जिंग पाइंट ही लगाया है बाकी करंट की सप्लाई तो उन्होंने कागज पर ही किया है ऐसी स्थिति में एक सज्जन ने एक हजार रूपये बतौर घूस लेकर एहसान जाताते हुए लैपटॉप चार्ज किया जिसे हम अब संभाल कर चला रहे हैं ताकि आपातकाल में बैकअप बना रहे। हम जो पैसे लेकर आए थे वह लैपटॉप और उसके चार्जिंग में खत्म हो गए। हमारा एटीएम कार्ड इंटरनेशनल ना होने के कारण यहां सपोर्ट नहीं कर पा रहा है इस कारण से अब पेन खरीदने तक को पैसे नहीं है उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ रही थी।
मैंने पूछा भगवान वह सब तो ठीक है पर आप भूलोक में किस प्रयोजन से पधारे है? आखिर बात क्या है जो स्वयं महाराज को भी साथ आना पड़ा है।
तब चित्रगुप्त के मन में एक बड़ी उदासी छा गई, उनके चेहरे पर दुःख की लकीरें स्पष्ट नजर आ रहे थे। कहने लगे कि "मानव हमारे भूलोक पर आने का और इस तरह भटकने का प्रयोजन सिर्फ तुम जैसे मानव ही है मैंने बड़े आश्चर्यचकित होकर पूछा हम मानव?
चित्रगुप्त ने कहा हां हां तुम सब ही।
तुम सब की नादानी ने हमें इस विकट स्थिति पर लाकर खड़ा कर दिया है।
चित्रगुप्त आगे कहने लगे यह वही भूलोक है जहां पर कभी स्वयं देवता भी जन्म लेने को तरसते थे, आज इस स्वर्ग से दुर्लभ धरा को तुमने अपने स्वार्थ के कारण नर्क से भी बुरा बना दिया है इतना कहकर महाराज चित्रगुप्त मौन हो गए।
मैंने फिर निवेदन पूर्वक कहा कि
महाराज अभी भूलोक में संकट बढ़ रहा है ,लोग कोरोना वायरस से मर रहे हैं, चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है, कितनों का घर उजड़ गया है, कितनों का रोजगार छिन गया है, लोग भूखमरी और बेरोजगारी से परेशान हो रहे हैं,और आप हमें ही दोष दे रहे है... कारण क्या है आप बतलाइए? क्योंकि आपकी इन बातों ने मेरे मन मस्तिष्क में भूचाल मचा दिया है और मेरे जानने की चेष्टा को और तीव्र कर दिया है कृपा कर बतलाइए आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?
तब मेरी बातों को सुनकर महाराज यमराज ने चिड़चिड़ाते हुए कहा- "मानव तुम्हारी प्रजाति बड़ी चतुर है। अपने दुखों का ढोल बजाकर अपनी गलती को छुपाना सदा से तुम्हारा आचरण रहा है। यह क्यों नहीं कहते कि हमारी गलतियों से यह सब हो रहा है, और परेशानी की बात करते हो तो सुनो - तुमसे ज्यादा परेशान हम हैं जितना ज्यादा तुम कोरोना से नहीं डरते उससे कहीं ज्यादा हम कोरोना से मरने वाले व्यक्तियों के प्राण ले जाने को डर रहे हैं। क्योंकि तुम्हारे पास तो पूरा भूलोक है और सुना है तुमने तो अब चांद पर भी जमीन खरीदना प्रारंभ कर दिया है यहां नहीं तो चांद पर सही, पर हमारे पास केवल एक ही यम लोक है और वह भी दो भाग में है, एक अच्छे कर्म के प्राणियों का और दूसरा बुरे कर्म के प्राणियों का। पर वह विभाग भी अब सिर्फ नाम मात्र को रह गया हैं क्योंकि मृत आत्माओं की संख्या से यमलोक रोज भरता जा रहा है। पिछले साल भर से मुझे और मेरे किसी कर्मचारियों को कोई अवकाश नहीं मिला है और ना ही हम तुम्हारी तरह कभी परिजन की बीमारी का,तो कभी तबियत खराब होने का, कभी रास्ते में टायर पंचर होने का तो कभी बस छूट जाने जैसा बहाना करके कोई छुट्टी भी ले सकते हैं।
मेरे समस्त यमदूत केवल मनुष्यों के प्राण को ही ले जाने में लगे है। एक तो पहले ही चौरासी लाख योनियों का लेखा-जोखा, स्वाभाविक मौत से मरने वाले व्यक्ति को ले जाने का ठेका, और ऊपर से अब करोना में मरने वाले प्राणियों का टेंडर भी तुमने हमारे माथे छोड़ दिया है। त्रस्त हो गए हैं हम।
हमारे यहां तुम्हारे जैसे हजारों बाबू और लिपिक नहीं है जिसे हम एक-एक कर फाइल पकड़ा दे यहां तो सारा हिसाब किताब चित्रगुप्त को ही देखना पड़ता है। जितना तकलीफ तुम्हें मृतकों को जलाने में हो रही है उससे कहीं ज्यादा तकलीफ हमें उन्हें ले जाने में हो रही है क्योंकि तुम तो एक साथ 10 लोगों को जलाकर चले जाते हो पर आगे ले जाने का सारा प्रोसेस तो हमारा ही है पहले तो श्राद्ध इत्यादि होता था जिससे हमारे यमदूतों के लिए रास्ते में खाने पीने का बंदोबस्त हो जाता था, पर अब तो कोरोना ने वह सब भी बंद करवा दिया है। तुम लोगों के इस करतूत से यमदूतों में अच्छी खासी नाराजगी है कुछ तो रिजाइन करने तक की बात कर चुके है, उन्हें मनाना कितना कठिन कार्य है यह सिर्फ मैं जानता हूं।
तुम तो लॉक डाउन करके घर पर आराम भी कर लेते हो पर हम लोग का कोई कर्मचारी पिछले सवा साल से एक पलक तक नहीं गिराया है ऊपर से तुम लोगों ने यज्ञ पूजन एवं हवन पर भी पाबंदी लगा दिया है जिससे हम सब का खाना पीना भी बंद हो गया है।
मैंने कहां महाराज क्या करें स्थिति ही ऐसी है, मजबूरी है।
तब यमराज प्रभु भौं तिरछी कर बोले वाह .......शाबाश जब क्रिकेट खेल का मजा ले रहे थे तब स्थिति ऐसी नहीं थी, चुनाव प्रचार करते हो तब स्थिति ऐसी नहीं होती और जब धर्म-कर्म यज्ञ की बात आती है तो स्थिति का हवाला दे देते हो।
अरे तुमसे बुरी स्थिति हमारी हो गई है अगर यही रवैया रहा तो 1 दिन हम सब समय से पूर्व सेवा निवृत्ति लेने को मजबूर हो जाएंगे ऐसा कह कर महाराज यमराज ने चित्रगुप्त से ड्रोन कैमरा निकालने को कहा ।
उनके चेहरे पर एक मुस्कान दिखा जो बताना चाह रहा था कि मानव, तकनीकी संसाधन के प्रयोग में हम भी तुमसे कम नही है। चित्रगुप्त ने ड्रोन कैमरे को उन्मुक्त आकाश में छोड़ा और स्वयं रिमोट से कमांड संभालते हुए ड्रोन को चलाने लगे यमराज प्रभु ने मुझे दिखाते हुए कहा कि देखो मानव तुम कहते हो कि संकट की घड़ी है,फिर भी तुम लोग कैसे मजे से घूम रहे हो, ना तो चेहरे पर मॉस्क है और ना ही 2 गज की दूरी। जिधर देखो केवल भीड़ नजर आ रही है ऊपर से कहते हो कि है बड़ी मजबूरी। तब मैंने भी ठीक उसी प्रकार पलटवार किया जिस प्रकार विपक्ष,सत्ताधारी पार्टी पर पलटवार करती है मैने कहा कि महाराज यदि भीड़ से कोरोना वायरस फैल रहा है तब तो अवश्य आपने उन नेताओं से भी शिकायत की होगी जो चुनाव प्रचार में लाखों लोगों की भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं।इतना सुनकर महाराज यमराज अचानक से चुप हो गए मैं बोला क्या हुआ महाराज चुप क्यों हो गए ?
तब चित्रगुप्त ने बड़े धीरे से बुदबुदाते हुए कहा कि यह आपने किन का नाम ले लिया? नेताओं को कुछ कहना तो दूर उनको देखकर तो हमारे महाराज भी डरते हैं। चित्रगुप्त की बातों को सुनकर यम प्रभु उन्हें घूर घूर के देखने लगे और कहने लगे कि चित्रगुप्त मानव के स्वार्थ ने, लालच ने, द्वेष की भावना ने, ना केवल भूलोक को बल्कि देवलोक सहित पूरे ब्रह्मांड को विचलित कर दिया है इनके कृत्य की चर्चा नित्य तीनों लोकों में हो रही है।
वे मुझ देखकर मानो समस्त संसार को संदेश देते हुए कहने लगे कि *हे मानव! अभी भी वक्त है सुधर जाओ नहीं तो ऐसा ना हो कि एक दिन यमलोक की स्थापना भूलोक में ही करनी पड़ जाए।* इतना कहना ही था तभी दो यमदूत दौड़कर आए और कहने लगे महाराज चलिए दो और मरीजों का ऑक्सीजन सिलेंडर खत्म होने वाला है हमें उसे ले जाना है ।
महाराज यमराज बड़े गमगीन भाव से अपना गदा और मृत्यु पास हाथ में लेकर चल पड़े।
पीछे-पीछे चित्रगुप्त और यम के दूत चले जा रहे थे, लोग बड़े मजे से गाड़ी में फर्राटे लगा रहे थे। ट्रेफिक पुलिस की टीम सीटी बजा बजाकर ट्रैफिक संभालने में लगी थी, और मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि सामने दुखी मन से जा रहे कोई और नही बल्कि स्वयं महाराज यम है और भूलोक के लोगों से कहीं ज्यादा उनके दिलो दिमाग में गम है।