नाले अलख जे बेडो तार मूहंजो ,, संत लाल साई

नाले अलख जे बेडो तार मूहंजो ,, संत लाल साई

नाले अलख जे बेडो तार मूहंजो ,, संत लाल साई

नाले अलख जे बेडो तार मूहंजो ,, संत लाल साई


अमर शहीद संत कंवर राम साहिब जी का 82 वा  शहादत दिवस 1 नवंबर को श्री झूलेलाल मंदिर झूलेलाल नगर चकरभाटा 
मनाया गया
कार्यक्रम की शुरुआत भक्त कंवर राम  साहेब जी के फोटो पर माला अर्पण  कर दीप प्रज्वलित करके की गई
संत लाल साई  जी के द्वारा
भक्त कवर राम साहिब जी के जीवन के बारे में प्रकाश डाला
साई  जी ने बताया कि
भगत कंवर राम साहिब जी का जन्म 13 अप्रैल अट्ठारह सौ पचासी सिंध प्रांत के शखर जिला मीरपुर माथे लो तहसील ग्राम  जरवार में हुआ
पिता का नाम ताराचंद माता का नाम तीर्थ बाई था
दोनों माता-पिता भक्ति में लीन रहते थे बेटे का नाम कवर  रखा

गरीब परिवार था जैसे ही कवर थोड़ा बड़ा हुआ माता ने कोहर बना कर दिए जाकर  बाजार में  बेचकर आ  और दो चार पैसे मिले तो घर का खर्चा चले
जब कवर  सर पर टोकरी में कोहर लेकर  गली-गली घूमने लगा और अपनी मीठी सुरीली आवाज में बोलने लगा कोहर ले लो कवर के 
कोहर एक घर में संत सतराम दास बैठे हुए थे उनके कानों में कवर की मीठी आवाज पहूंचि  तो उन्होंने अपने एक सेवादार से कहा देखो कौन कोहर बेच राह है उसको लेकर आओ
सेवादार बाहर गया और कवर को लेकर आया सतराम दास बाहर निकले देखा दुबला पतला छोटी सी उम्र का लड़का सर पर टोकरी भर कोहर  लेकर खड़ा था सतराम दास ने कहा हमें भी  कोहर  दे दो पर 
हमारे पास पैसे नहीं है कवर ने कहा साइ कोई बात नहीं आप कोहर  ले  लीजिए सतराम दास को  कवर  की बातें सुनकर बहुत ही प्रफुल्लित हुए और वह तो अंतर्यामी थे जान गए थे कि यह बालक बड़ा होकर अपने माता-पिता अपने कुल का अपने शहर का अपने प्रदेश का प्रदेश का नाम गर्व से ऊंचा करेगा और यह बालक साधरण  बालक नहीं है सतराम दास ने उन्हें अपना शिक्षय  बना लिया दिन बीतते गए समय निकलता गया  कवर  बड़ा हो गया जगह-जगह गांव गांव शहर शहर में जाकर रात्रि कालीन भगत करते उनकी मधुर आवाज सुरीली  आवाज सुनकर   दूर-दूर तक लोगों को अपनी ओर खींच लाती
अपने भक्ति से अपने गुरु का भी मान सम्मान बढ़ाया और दिल जीता कवर अब भक्त  कवर राम बन गया एक  दिन  एक गांव में भगत कर रहे थे कि उस गांव में रहने वाली एक माता का छोटा सा पुत्र का स्वर्गवास हो गया माता बहुत रोने लगी उसकी पड़ोसन ने बताया कि बहन  रो मत पास ही में भगत कंवर राम साहब की भगत चल रही है तुम वहां अपने बच्चे को ले चलो और जब कवर राम  साहेब बच्चों को लोरी दे तो तुम भी अपने बच्चे को दे देना लोरी देने के लिए वह माता अपने बच्चे को लेकर पहुंची  जैसे ही उसने बच्चे को भगत कंवर राम के हाथों में दिया और कहा बाबा इसे भी  लोरी दो तब भक्त कवर राम साहब ने बच्चे को गोद में उठाया तो समझ गए बच्चा मृत है  अंदर ही अंदर अपने गुरु सतराम दास को याद करने लगे और कहने लगे हैं प्रभु आज इस दास की लाज रख लो इस संकट की घड़ी में आप ही मेरे सहारा हो इस बच्चे को जीवित कर दो
और भक्ति में लीन होकर भजन गाने लगे

नाले अलख जे बेडो तार महंजो 
जब यह भजन समाप्त हुआ और चमत्कार हुआ एक गुरु ने अपने शिक्षय किं पुकार सुन ली उसकी लाज रखी वह बच्चा जीवित हो गया वह रोने लगा मां ने अपने मृत बच्चे की आवाज सुनकर भक्त कवर राम के चरणों में गिर पड़ी और माफी मांगी कि मुझे माफ कर देना मैंने आपको अपना  मरा हुआ  बच्चा दिया मैं जानती थी इसे आप ही जीवित कर सकते हैं और कोई नहीं
खुशी के मारे जोर जोर से लोगों को बताने लगी संत  कवर राम ने चमत्कार कर दिया मेरे मरे  हुवे बच्चे को जीवित कर दिया संत कल्याणकारी होते हैं  संत की शक्ति अपार होती है पर उसका वह प्रदर्शन नहीं करते हैं उस दिन भी भक्त कवर राम साहेब  अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं करते पर ऐसी परीक्षा की घड़ी आ गई कि उसे प्रभु की भक्ति दिखानी पड़ी यह बात पूरे सिंध में आग की तरह फैल गई अब तो भक्त कवर  राम साहेब की दूर-दूर तक चर्चा होने लगी उनकी भगत में हजारों की संख्या में लोग आते थे सुनने के लिए हिंदू हो मुस्लिम सिख हो या कोई अन्य धर्म के हो सभी पंथ धर्म के लोग आते थे पर कुछ अत्याचारी लोगों को यह पसंद नहीं था कि हिंदू मुस्लिम वह सब आपस में इनका भाईचारा प्रेम बना रहे उस समय आजादी की लड़ाई भी जोरों पर चल रही थी कुछ अत्याचारियो ने  भक्त  कवर  राम साहेब को मारने के लिए प्लान बनाया और जब भक्त कवर राम साहिब सिंध की छोटी स्टेशन रुक मैं ट्रेन में बैठ कर दूसरे शहर जा रहे थे तब अत्याचारी ट्रेन में पहुंचे वह भक्त कवर राम साहेब से आशीर्वाद लिया कि आज जिस काम के लिए हम आए हैं वह हमारा पूरा हो भक्त कवर राम साहेब जानते थे कि यह लोग मुझे ही मारने आए हैं फिर भी उन्होंने उनको आशीर्वाद दिया कि आज तुम्हारा कार्य सफल होगा ऐसे संत परोपकारी होते हैं कि अपने को  मारने  वालों को भी आशीर्वाद देते हैं
और उन अत्याचारी  ने ट्रेन के अंदर भक्त कवर राम साहिब जी को गोली मारकर शहीद कर दिया जैसे ही यह खबर सिंध में फैली पूरे सिंध में आंसुओं का सैलाब आ गया कोई ऐसा घर नहीं बचा कोई ऐसा आदमी नहीं था जिसके आंखों से आंसू ना बह हो हर इंसान यह बात सुनकर रोने लगा वह काला दिन व काली घड़ी थी रात्रि 10:00  बजे 1 नवंबर 1939 जब भक्त  कवर राम साहेब शहीद हुए वह हम सब को छोड़कर प्रभु के चरणों में पहुंचे सच्चे संत थे अपने गुरु की वाणी के अनुसार अपने गुरु का अपने माता-पिता का अपने गांव का  प्रदेश का देश का नाम गर्व से ऊंचा करके गए आज भी उसी स्टेशन में 1 नवंबर को भक्तजन पहुंचते हैं वह मोमबत्ती व  दीप जलाकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ऐसे संत को हमारा बारंबार कोटि-कोटि नमन
भारत में भी शहर शहर में लोगों ने अपने घरों में दुकान में  दीप प्रज्वलित करके  भक्त कवर  राम साहिब जी को श्रद्धांजलि अर्पित की 

कार्यक्रम के आखिर में संत लाल साई  जी के द्वारा कई भक्ति भरे भजन गाय गए इस पूरे कार्यक्रम सोशल मीडिया के माध्यम से लाइव प्रसारण किया गया हजारों की संख्या में भक्तों ने घर बैठे इस कार्यक्रम को  देखा वह भाव विभोर हो गए
अंत में 2 मिनट मौन रहकर प्रार्थना की गई वह भक्त कवर राम  साहेब जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई

श्री विजय दुसेजा जी की खबर

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